धारा नगरी राजा भोज की नगरी है, एक ज़माने में कला और संस्कृति का केंद्र आज एक छोटे से क़स्बे से बड़ा नहीं है। स्वतंत्रता के समय देश की ५२६ रियासतों में से एक धार भी थी, यहाँ पंवार शासकों का राज था। यह मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल इलाक़ों में गिना जाता है, अब चूँकि यह ज़िला मुख्यालय है इसलिए यहाँ पर सरकारी अफ़सर ही अति विशिष्ट व्यक्ति माने जाते हैं । कलेक्टर इंजीनियर पुलिस अधिकारी व जज ही सरकारी महकमे के नुमाइंदे थे और यहाँ पर उनकी हर आज्ञा जनता के लिए पत्थर की लकीर होती है।अधिकारी गण ज़्यादातर वक़्त अपने अपने ऑफ़िस में या फिर टूर पर रहते थे , पर जब भी वे धार में रहते थे, शाम के समय उनके मनोरंजन के लिए वहाँ एक क्लब था।सभी पुरानी रियासतों में अंग्रेज़ बहादुर अपने रेसीडेंट अफ़सर की नियुक्ति करते थे ताकि वहाँ के राजा या नवाब पर नज़र रखी जा सके । लाट साहब के साथ राजपरिवार के सदस्य भी क्लब में सभी प्रकार के खेल जैसे टेनिस बिल्यर्ड ब्रिज आदि खेला करते थे।धार में उदय रंजन क्लब भी ऐसा ही क्लब था, जिसका नाम वहाँ के राजा के ही नाम पर था।अंग्रेज़ चले गए पर क्लब की संस्कृति छोड़ गए और ब्राउन साहिबों ने गोरे साहबों की जगह ले ली ।उस ज़माने में टीवी नहीं था, न ही कोई मोबाइल फ़ोन, तो ज़्यादातर संभ्रांत परिवारों के लोगों के लिए क्लब ही एक ऐसी जगह थी जहाँ पर बैठ कर कुछ हल्की फुल्कि बातचीत हँसी मज़ाक़ हो जाती थी, कुछ खिलाड़ी क़िस्म के लोग खेलने में मज़ा लेते थे, आख़िर यह सुविधाएँ सभी के नसीब में तो होती नहीं थी।
अब अधिकारी गण वहाँ आते थे तो ज़ाहिर है की व्यापारी वर्ग को भी वहाँ शिरकत करना ही पड़ती थी । उनके लिए अफ़सरों से अच्छे सम्बंध बना के रखना निहायत ही ज़रूरी था, इसलिए वे भी किसी ना किसी बहाने से क्लब पहुँच जाते थे, साहब के आगे पीछे घूम कर, उनकी लल्लो चप्पो कर उन्हें ख़ुश रखने की कोशिशों में लगे रहते थे।टेनिस जैसा खेल अव्वल तो महँगा बहुत था, रेकेट का दाम, फिर क्लब की सदस्यता पर ख़र्च और फिर इसे सीखना कौनसा आसान था, कोई गुल्ली डंडा तो था नहीं जो बचपन से खेलते आ रहे हों। इस सब से भी ज़्यादा मुश्किल की बात तो यह थी की अफ़सर को अकेला नहीं पकड़ा जा सकता था जब उनसे कुछ ज़रूरी गुफ़्तगू की जा सके। यह तो कार्ड टेबल पर ही आसानी से हो सकता था, वैसे भी ताश का रंग तो शाम ढलने के बाद ही जमता था, और दो तीन बाज़ी जिताने के बाद साहब का मूड भी ख़ुशगवार हो जाता था। कई बार देर रात तक क्लब में ताश की बाज़ियाँ चलती रहती थी, अरे भाई ग़लत मत समझिए कोई जुआ थोड़े ही खेलते थे बस अपना मन बहलाने के लिए खेलते थे उस दौरान यदि कुछ बातचीत होती थी तो इसे बेइमानी थोड़े ही माना जाता है ।खेल में हार जीत तो लगी रहती है पर अफ़सर लोग होशियार तो थे ही, इसलिए उनका अक्सर बाज़ी मार ले जाना स्वाभाविक ही था ।
कलेक्टर एसपी इंजीनियर लोग ज़्यादा व्यस्त रहते थे , अक्सर दौरे पर साइट के निरीक्षण के लिए जाना पड़ता था , पर कभी कभार फिर भी ऐसे ही ज़रा माहौल को जानने और समझने के लिए दिख जाते थे। जज भी कम ही नज़र आते थे , एक तो उनकी कचहरी शाम देर तक चलती और फिर उन्हें यह भी ध्यान रखना पड़ता था कि ज़्यादा मेल मिलाप उनके लिए अच्छा नहीं समझा जाता है।फिर भी कुछ थे जो टेनिस के इतने शौक़ीन थे कि उनसे रहा नहीं जाता था। जब जज क्लब आएँ तो वकीलों को तो आना ही पड़ता था, आख़िर उनके हर शॉट की तारीफ़ जो करनी होती थी। फिर कभी जज साहब महरबान हो जाएँ और उनके साथ एक दो सेट खेल लें तो उनकी आत्मा अंदर तक धन्य हो जाती थी। मुवक्किल भी देखते थे की वक़ील साहब जज साहब के इतने ख़ास हैं कि साथ साथ उठते-बैठते और खेलते हैं, जिससे उन्हें विश्वास हो जाता था की उनका केस तो जिता जिताया ही समझो।
ऐसे ही एक होनहार अफ़सर वहाँ सेल्स टैक्स इंस्पेक्टर बन कर आए, रूवाबदार, बल खाती मूँछे, तीखे नाक नक़्श के धनी, ऊँचा पूरा क़द अपने आप को अमिताभ बच्चन से काम ना समझते थे । टेनिस में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं थी उन्हें बिल्यर्ड पसंद था, दिमाग़ का खेल है, खेल की बारीकियों को समझते थे, ज्यमिति (geometry ) के कोण के सिद्धांत का प्रयोग करते थे और वहाँ व्यापारी वर्ग पर छाए हुए थे।टेबल पर अपने जौहर दिखाने में मशगूल उस दिन वे अपने ६-८ वर्ष के चिरंजीव को भी साथ लाए थे। खेल अच्छा चल रहा था, रोज़ की तरह वे अपने विरोधी इमरतिमल जी जैन से, जो कि एक व्यापारी ही थे , से काफ़ी आगे थे। जैन साहब ने सोचा आज साहब को मक्खन लगाने का अच्छा मौक़ा है, उनके बेटे के साथ कुछ मज़ेदार बात करके शायद उन्हें कुछ और फ़ायदा हो जाए। यही सोच कर, उन्होंने बड़े प्यार से बच्चे से पूछा, "और पट्ठे क्या हाल हैं?" बच्चे को यह हिमाक़त क़तई रास नहीं आई, आज तक किसीने उसे "बाबा साहब" के अलावा किसी और तरीक़े से पुकारा ही नहीं था, उसने पलट कर जवाब दिया "तू ही होगा उल्लू के पट्ठे!" इमरतीमल जी यथा नाम तथा गुण, इतने मीठे कि इमरती भी फीकी पड़ जाए बोले "मान गए उस्ताद, अभी से ये जलवे"। डिप्टी कलेक्टर से बोले, "पूत के पांव पालने में, आगे चल कर जरूर आपका नाम रोशन करेगा"