Wednesday, November 13, 2024

उल्लू के पट्ठे

 धारा नगरी राजा भोज की नगरी है, एक ज़माने में कला और संस्कृति का केंद्र आज एक छोटे से क़स्बे से बड़ा नहीं है। स्वतंत्रता के समय देश की ५२६ रियासतों में से एक धार भी थी, यहाँ पंवार शासकों का राज था। यह मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल इलाक़ों में गिना जाता है, अब चूँकि यह  ज़िला मुख्यालय है इसलिए यहाँ पर सरकारी अफ़सर ही अति विशिष्ट व्यक्ति माने जाते हैं । कलेक्टर  इंजीनियर पुलिस अधिकारी व जज ही सरकारी महकमे के नुमाइंदे थे और यहाँ पर उनकी हर आज्ञा जनता के लिए पत्थर की लकीर होती है।अधिकारी गण ज़्यादातर वक़्त अपने अपने ऑफ़िस में या फिर टूर पर रहते थे , पर जब भी वे धार में रहते थे, शाम के समय उनके मनोरंजन के लिए वहाँ एक क्लब था।सभी पुरानी रियासतों में अंग्रेज़ बहादुर अपने रेसीडेंट अफ़सर की नियुक्ति करते थे ताकि वहाँ के राजा या नवाब पर नज़र रखी जा सके । लाट  साहब के साथ राजपरिवार के सदस्य भी क्लब में सभी प्रकार के खेल जैसे टेनिस बिल्यर्ड ब्रिज आदि खेला करते थे।धार में उदय रंजन क्लब भी ऐसा ही क्लब था, जिसका नाम वहाँ के राजा के ही नाम पर था।अंग्रेज़ चले गए पर क्लब की संस्कृति छोड़ गए और ब्राउन साहिबों ने गोरे साहबों की जगह ले ली ।उस ज़माने में टीवी नहीं था, न ही कोई मोबाइल फ़ोन, तो ज़्यादातर संभ्रांत परिवारों के लोगों के लिए  क्लब ही एक ऐसी जगह थी जहाँ पर बैठ कर कुछ हल्की फुल्कि बातचीत हँसी मज़ाक़ हो जाती थी, कुछ खिलाड़ी क़िस्म के लोग खेलने में मज़ा लेते थे, आख़िर यह सुविधाएँ सभी के नसीब में तो होती नहीं थी। 

अब अधिकारी गण वहाँ आते थे तो ज़ाहिर है की व्यापारी वर्ग को भी वहाँ शिरकत करना ही पड़ती थी । उनके लिए अफ़सरों से अच्छे सम्बंध बना के रखना निहायत ही ज़रूरी था, इसलिए वे भी किसी ना किसी बहाने से क्लब पहुँच जाते थे, साहब के आगे पीछे घूम कर, उनकी लल्लो चप्पो कर उन्हें ख़ुश रखने की कोशिशों में लगे रहते थे।टेनिस जैसा खेल अव्वल तो महँगा बहुत था, रेकेट का दाम,  फिर क्लब की सदस्यता पर ख़र्च और फिर इसे सीखना कौनसा आसान था, कोई गुल्ली डंडा तो था नहीं जो बचपन से खेलते आ रहे हों। इस सब से भी ज़्यादा मुश्किल की बात तो यह थी की अफ़सर को अकेला नहीं पकड़ा जा सकता था जब उनसे कुछ ज़रूरी गुफ़्तगू की जा सके। यह तो कार्ड टेबल पर ही आसानी से हो सकता था, वैसे भी ताश का रंग तो शाम ढलने के बाद ही जमता था, और दो तीन बाज़ी जिताने के बाद साहब का मूड भी ख़ुशगवार हो जाता था। कई बार देर रात तक क्लब में ताश की बाज़ियाँ चलती रहती थी, अरे भाई ग़लत मत समझिए कोई जुआ थोड़े ही खेलते थे बस अपना मन बहलाने के लिए खेलते थे उस दौरान यदि कुछ बातचीत होती थी तो इसे बेइमानी थोड़े ही माना जाता है ।खेल  में हार जीत तो लगी रहती है पर अफ़सर लोग होशियार तो थे ही, इसलिए उनका अक्सर बाज़ी मार ले जाना स्वाभाविक ही था ।

 कलेक्टर एसपी  इंजीनियर लोग ज़्यादा व्यस्त रहते थे , अक्सर दौरे पर साइट के निरीक्षण के लिए जाना पड़ता था , पर कभी कभार फिर भी ऐसे ही ज़रा माहौल को जानने और समझने के लिए दिख जाते थे। जज भी कम  ही नज़र आते थे , एक तो उनकी कचहरी शाम देर तक चलती और फिर उन्हें यह भी ध्यान रखना पड़ता था कि ज़्यादा मेल मिलाप उनके लिए अच्छा नहीं समझा जाता है।फिर भी कुछ थे जो टेनिस के इतने शौक़ीन थे कि  उनसे रहा नहीं जाता था। जब जज क्लब आएँ तो वकीलों को तो आना ही पड़ता था, आख़िर उनके हर शॉट की तारीफ़ जो करनी होती थी। फिर  कभी जज साहब महरबान हो जाएँ और उनके साथ एक दो सेट खेल लें तो उनकी आत्मा अंदर तक धन्य हो जाती थी। मुवक्किल भी देखते थे की वक़ील साहब जज साहब के इतने ख़ास हैं कि  साथ साथ उठते-बैठते और खेलते हैं, जिससे उन्हें विश्वास हो जाता था की उनका केस तो जिता जिताया ही समझो।

ऐसे ही एक होनहार अफ़सर वहाँ सेल्स टैक्स इंस्पेक्टर बन कर आए, रूवाबदार, बल खाती मूँछे, तीखे नाक नक़्श के धनी, ऊँचा पूरा क़द अपने आप को अमिताभ बच्चन से काम ना समझते थे । टेनिस में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं थी उन्हें बिल्यर्ड पसंद था, दिमाग़ का खेल है, खेल की बारीकियों को समझते थे, ज्यमिति (geometry ) के कोण के सिद्धांत का प्रयोग करते थे और वहाँ व्यापारी वर्ग पर छाए हुए थे।टेबल  पर अपने जौहर दिखाने में मशगूल उस दिन वे अपने ६-८ वर्ष के चिरंजीव को भी साथ लाए थे। खेल अच्छा चल रहा था, रोज़ की तरह वे अपने विरोधी इमरतिमल जी जैन से,  जो कि  एक व्यापारी ही थे , से काफ़ी आगे थे। जैन साहब ने सोचा आज साहब को मक्खन लगाने का अच्छा मौक़ा है, उनके बेटे के साथ कुछ मज़ेदार बात करके शायद उन्हें कुछ और फ़ायदा हो जाए। यही सोच कर, उन्होंने बड़े प्यार से बच्चे से पूछा, "और पट्ठे  क्या हाल हैं?" बच्चे को यह हिमाक़त क़तई  रास नहीं आई, आज तक किसीने  उसे "बाबा साहब" के अलावा किसी और तरीक़े से पुकारा ही नहीं था, उसने पलट कर जवाब दिया "तू ही होगा उल्लू के पट्ठे!" इमरतीमल जी यथा नाम तथा गुण, इतने मीठे कि इमरती भी फीकी पड़ जाए बोले "मान गए उस्ताद, अभी से ये जलवे"। डिप्टी कलेक्टर से बोले, "पूत के पांव पालने में, आगे चल कर  जरूर आपका नाम  रोशन करेगा"


सरकारी सम्पत्ति आपकी अपनी है

                                                         


न्यायाधीश महोदय श्री  जगदीश माथुर कुछ ही समय पहले इस शहर में पधारे थे, सुना था कि वे लंदन से बार ऐट लॉ थे हमारे देश में आज भी  घर की मुर्ग़ी दाल बराबर ही है, अंग्रेज़ों ने यह कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा की २०० साल की ग़ुलामी का असर आज़ादी के इतने सालों बाद भी रहेगा।इसीलिए तो अंग्रेज़ी में बोलना शान की बात समझी जाती है और यदि कोई ब्रिटेन में पढ़ कर आया है तब तो वो माई  बाप ही है, साक्षात गोरा साहब का अवतार।चूँकि साहब लंदन से पढ़ कर आए थे तो उनका दर्जा सभी की नज़र में आला था। दुर्भाग्य से उन्हें कोई संतान नहीं थी, ऐसे में साहब और मेम साहब अपने पुत्रवत कुत्ते पर जान छिड़कते थे, बड़े प्यार से उसे "सनी" नाम से ही पुकारते थे।उनके बंगले में, जैसा उन दिनों चलन था, एक दर्जन के क़रीब नौकर चाकर काम करते थे, सभी कचहरी में दिहाड़ी पर रखे हुए थे पर उनका काम घर पर साहब की सेवा टहल करना ही था। एक दिन गंगाराम, उनका माली काफ़ी दुखी दिख रहा था, पूछे जाने पर उसने कहा आज उसे मेम साहब ने सज़ा दी थी, कारण पूछने पर पता लगा कि अनजाने में उसने उनके  "कुत्ते को  कुत्ता" कह दिया था, अब  "सनी"  को कुत्ता कहना तो अक्षम्य अपराध था , इस की सज़ा के तौर पर उसे दीवार की ओर  मुँह कर के सुबह से शाम तक खड़ा रहने का हुक्म दिया गया था; वह भी इसलिए कि वह एक ईमानदार वफ़ादार नौकर  था अन्यथा उसे नौकरी से ही हाथ धोना पड़ता।

मेम साहब को एक शौक़ और था, तरह तरह के काकभगोड़े (scarecrow) बना कर उन्हें अपने इस  बंगले के खेत में लगाना। यह काकभगोड़े कम रावण के पुतले ज़्यादा नज़र आते थे, लगता था जैसे रावण, कुम्भकर्ण और मेघनाद वहाँ हमेशा मौजूद थे। पर मजाल है कि उनके इस अजीब से शौक़ के बारे में कोई कुछ भी मज़ाक़ कर सके, इसलिए आगंतुक हमेशा इस नायाब शौक़ की तारीफ़  करते ना अघाते थे।



बंगला
भी अंगेजों के  समय का ही था, आलीशान क़रीब बीघा ज़मीन पर, बाक़ी अफ़सरों की कालोनी से हट के। सरकार नहीं चाहती थी कि जज साहब, जनता जनार्दन या बाक़ी अफ़सरों से ज़्यादा मिले जुलें; और सरकार का यह आदेश तो सर आँखों पर सभी अफ़सर रखते थे, अंग्रेज़ी की कहावत है familiarity breeds contempt, अर्थात ज़्यादा मेल मिलाप रखने से आपकी इज़्ज़त  कम  हो जाती है। शासकीय सेवक होने और जनता के सेवक होने में फ़र्क़ था, क्योंकि जनता के सेवक  होने का दावा तो राजनेता ही कर सकते थे परंतु सेवा भाव दोनों में ही नदारद था।आख़िर  इतनी मुश्किल से माई बाप कहलाने का अधिकार मिलता है और वो भी इन गँवारों से मेलजोल बढ़ाकर गँवा दें यह कहाँ कि अक़्लमंदी है? इसलिए अधिकारी वर्ग इन्हें हमेशा उनकी जगह पर ही रखता था।

ख़ैर अभी तो उस बंगले के बारे में बात हो रही थी, तो बीघा ज़मीन को इस्तेमाल तो करना ही था आख़िर हमारे देश में इतनी भुखमरी जो थी, तो बक़ायदा वहाँ पर खेती होती थी, कुछ फलों के पेड़, जो पहले से ही वहाँ पर लगे हुए थे, उसके अलावा कुछ ताज़ी हरी सब्ज़ियाँ और थोड़ा बहुत चना और गेहूँ की भी क्यारियाँ थी।मेम साहब वीट ग्रास जूस पीती थी, तो उनके लिए यह भी इंतज़ाम किया गया था। फिर भी कुछ ज़मीन ऐसी थी जहाँ पर सिवाय घास के कुछ नहीं उगाया जा सकता था तो  उसे चारागाह सा ही रहने दिया था। यहाँ पर शुक्ला  परिवार के साथ उनका सम्बंध जुड़ा, वो ऐसे कि, हमारे यहाँ एक गाय थी, बहुत सुंदर, सफ़ेद मारवाड़ी नस्ल की, उसके सींग भी बिलकुल समानुपाती घुमावदार और मुँह तो साक्षात कामधेनु। उसके लिए हरे चारे की व्यवस्था करनी थी, तो शुक्ला जी  पहुँचे जज साहब के घर, की यदि उन्हें आपत्ति ना हो तो यह चारा वे उनकी  गाय के लिए ले जाना चाहते थे।जज साहब ने थोड़ी देर सोचा और फिर कहा १०० रुपए दीजिए और ले जाइए, शुक्ला जी  को लगा साहब मज़ाक़ कर रहे हैं और मुस्कुराते हुए  बोले हाँ हाँ अवश्य। जज साहब ने फ़रमाया आप इसे मज़ाक़ ना समझे, “आइ ऐम सीरीयस शुक्ला जी  ने उन्हें १०० रुपए अग्रिम जमा किए और गए। इत्तेफ़ाक से जज साहब का तबादला हो गया और उन्हें तुरंत जाना पड़ा, शुक्ला जी  फिर उनके पास पहुँचे की अब चूँकि वे जा रहे हैं, उन्हें उनके पैसे लौटा दिए जाएँ, पर उन्होंने आश्वासन दिया की उनकी जगह जो साहब रहे हैं वे यह चारा हमें ले जाने देंगे।शुक्ला जी  को भरोसा तो नहीं था पर जज साहब से कैसे उलझ सकते थे तो लौट आए, इस आशा के साथ कि शायद उन दोनों साहबों के बीच इस बारे में ज़रूर चर्चा होगी और उनकी  गाय इस चारे से वंचित नहीं होगी। 

नए साहब  श्री दिवाकर  जैन पधारे और शुक्ला जी  उनसे मिलने पहुँचे, वे  बड़ी गर्मजोशी से मिले, चाय पिलाई पर जैसे ही चारे के बारे में बात छिड़ी वे एकदम गरम हो गए और कहने लगे, यदि आपको यहाँ से चारा ले जाना है, तो १०० रुपए अब उन्हें देने होंगे। शुक्ला जी  ने बताया की  माथुर  साहब  को १०० रुपए अग्रिम जमा किए थे, और उन्होंने कहा था कि अब दुबारा पैसे देने की ज़रूरत नहीं है।जैन  साहब ने तल्ख़ी से कहा "फिर आप उन्ही से बात करें " १०० रुपए उस समय कोई मामूली रक़म भी नहीं थी और गाय के चारे का बंदोबस्त भी नहीं हुआ था, तो  माथुर  साहब को पत्र लिखा गया और उनसे विनती की गयी की वे ही इस मसले का हल निकाले।उन्होंने  पत्र का उत्तर दिया कि उन्होंने इस बाबत जैन साहब को पत्र लिख दिया है, शुक्ला जी  फिर बंगले पर पहुँचे  पर जैन साहब ने कहा हाँ मुझे पत्र प्राप्त हुआ और मैंने उनको इसका जवाब दे दिया है, पर चारा तो आपको १०० रुपए जमा करने पर ही मिलेगा। माथुर साहब को फिर पत्र लिखा गया कि यदि मुनासिब  समझें तो १०० रुपए लौटा दें  ताकि जैन साहब को पैसे दे कर चारे का इंतज़ाम कर सके। पत्र का फिर उत्तर आया कि उन्होंने एक और पत्र जैन साहब को लिख दिया है, परंतु उस का भी कोई असर नहीं हुआ,  तीन महीने गुज़र चुके थे वहाँ घास  पीली पड़ने लगी थी और ना तो चारा ही मिला ना ही पैसे। शुक्ला जी  के सब्र का बाँध अब जवाब दे गया, उन्होंने माथुर साहब को लिखा कि चारा तो मिला नहीं और ना  ही  उसकी अब ज़रूरत है यदि वे ठीक समझे तो बस उन्हें पैसे लौटा दें।कुछ दिनों बाद १०० रुपए का मनी ऑर्डर गया, गाय के लिए चारा कहीं और से लाया गया और क़सम ली की अफ़सरों के चक्कर में ना ही पड़े तो बेहतर है।मज़ेदार बात यह है की बंगला सरकारी तो वहाँ  की उपज भी सरकारी और उससे होने वाली आमदनी भी सरकारी कोष में जमा होनी थी, परसरकारी सम्पत्ति तो आपकी अपनी है


सुयश शर्मा