तारीफ़ पे तारीफ़, तारीफ़ पे तारीफ़ अमेरिका के राष्ट्रपति श्री डॉनल्ड ट्रम्प महोदय भी परेशान हो गए थे, आख़िर कब तक कोई अपनी ही तारीफ़ सुनता रहेगा, उनके सलाहकारों ने उनके कान पका दिए थे। यह अलग बात है कि वे टैरिफ़ की बात कर रहे थे और हमारे प्रिय पोटस ने समझा ये इकतरफ़ा तारीफ़ की बात कर रहे हैं, और उन्होंने कहा हम अमेरिकन हैं हम लेते हैं तो देना भी जानते हैं, तो कोई आश्चर्य नहीं कि उन्होंने कहा जब हमारी तारीफ़ हो रही है तो हमें भी तारीफ़ करना चाहिए। दोनों पक्षों को बराबरी से मिलना चाहिए और यही है इस टैरिफ़ युद्ध का मूल कारण।अब कितनी तारीफ़ की बात निकली तो वो तो दूर तलक जानी ही थी,माननीय ट्रम्प महोदय का आदेश हुआ हम बड़े हैं तो जितनी हमारी तारीफ़ वे करते हैं उसका आधा हम उन्हें दे देते हैं।
अब चाहे टैरिफ़ हो या तारीफ़ हो तो गया ही है, जब तक ट्रम्प जी समझ पाते इस टैरिफ़ और तारीफ़ का अंतर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत। बहरहाल बाक़ी की दुनिया तो शम्मी कपूर की तरह गा उठी है, “तारीफ़ करूँ क्या उसकी, जिसने तुम्हें बनाया!“
टैरिफ़ भी एक प्रकार की तारीफ़ ही है जो देश अपने प्रिय देशों से व्यापार के लिए लगाते हैं जो जितना प्यारा हो उसे उसी अनुपात में टैरिफ़ की प्राप्ति होती है। पिछले तक़रीबन चार पाँच दशकों से चीन और अमेरिका का बहुत याराना रहा है, इतना गहरा की दोनों ने मिल कर ही रूस के टुकड़े कर दिए। आज जब अमेरिका को ऐसा लगने लगा की इस दोस्ती में कुछ और जोड़ा जाए तो फिर, “कारोबार में घोली जाए थोड़ी टैरिफ़ की मिठास, तो होगा जो नशा यूँ तैयार वो व्यापार है” वाह वाह क्या बात है……।
व्यापार में ऊँच नीच तो चलती रहती है तो इस टैरिफ़ नुमा तारीफ़ से क्या डरना, चीन ने भी अपनी मोहब्बत का इज़हार कुछ इसी अन्दाज़ में पूरे उत्साह के साथ अपने टैरिफ़ लगा कर किया है।बाक़ी देश भी इस खेल में पीछे नहीं रहना चाहते हैं आख़िर उनका की भी तो कुछ रसूख़ है तो कनाडा और यहाँ तक कि मेक्सिको ने भी अपनी ओर से थोड़ा थोड़ा सहयोग कर ही दिया।हाँ भारत थोड़ा हिचकिचाता हुआ सा नज़र आता है, इस सोच में है की वैसे ही पहले मनमोहन जी जॉर्ज बुश (2008 ओवल ऑफ़िस) की और मोदी जी ट्रम्प जी की काफ़ी तारीफ़ों के पुल बाँध चुके हैं। तो ऐसे में अब टैरिफ़ के भी चक्कर में कौन पड़ें ।
व्यापार एक बोर्ड गेम है जिस से अंग्रेज़ और हमारे देसी अंग्रेज़ मनॉपली(monopoly) के नाम से वाक़िफ़ हैं। आप सभी ने बचपन में खेला होगा और कुछ शहर हवाई अड्डे होटेल आदि ख़रीदे और बेचे होंगे, कुछ किराए पर दिए होंगे बैंक से और क़र्ज़ भी लिया होगा। खेल में मज़ा भी आता था ख़ास तौर से, जब सामने वाला दिवालिया हो जाता था, अभी भी ये दुनिया का व्यापार ही तो है। जीतने का मज़ा तभी है जब विरोधी देश भी इसी तरह मुफ़लिस हो जाएँ।
एक और बात, टैरिफ़ यानी “कर”, “कर” शब्द में ही कर्म छिपा है, संस्कृत में कर का अर्थ ‘हाथ’ होता है तो हाथों से ही ट्रम्प जी ने हस्ताक्षर ‘कर’ के हम सभी को कर्मयोगी बनने की प्रेरणा ही तो दी है, हमें तो उनका आभारी होना चाहिए।