Wednesday, November 13, 2024

सरकारी सम्पत्ति आपकी अपनी है

                                                         


न्यायाधीश महोदय श्री  जगदीश माथुर कुछ ही समय पहले इस शहर में पधारे थे, सुना था कि वे लंदन से बार ऐट लॉ थे हमारे देश में आज भी  घर की मुर्ग़ी दाल बराबर ही है, अंग्रेज़ों ने यह कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा की २०० साल की ग़ुलामी का असर आज़ादी के इतने सालों बाद भी रहेगा।इसीलिए तो अंग्रेज़ी में बोलना शान की बात समझी जाती है और यदि कोई ब्रिटेन में पढ़ कर आया है तब तो वो माई  बाप ही है, साक्षात गोरा साहब का अवतार।चूँकि साहब लंदन से पढ़ कर आए थे तो उनका दर्जा सभी की नज़र में आला था। दुर्भाग्य से उन्हें कोई संतान नहीं थी, ऐसे में साहब और मेम साहब अपने पुत्रवत कुत्ते पर जान छिड़कते थे, बड़े प्यार से उसे "सनी" नाम से ही पुकारते थे।उनके बंगले में, जैसा उन दिनों चलन था, एक दर्जन के क़रीब नौकर चाकर काम करते थे, सभी कचहरी में दिहाड़ी पर रखे हुए थे पर उनका काम घर पर साहब की सेवा टहल करना ही था। एक दिन गंगाराम, उनका माली काफ़ी दुखी दिख रहा था, पूछे जाने पर उसने कहा आज उसे मेम साहब ने सज़ा दी थी, कारण पूछने पर पता लगा कि अनजाने में उसने उनके  "कुत्ते को  कुत्ता" कह दिया था, अब  "सनी"  को कुत्ता कहना तो अक्षम्य अपराध था , इस की सज़ा के तौर पर उसे दीवार की ओर  मुँह कर के सुबह से शाम तक खड़ा रहने का हुक्म दिया गया था; वह भी इसलिए कि वह एक ईमानदार वफ़ादार नौकर  था अन्यथा उसे नौकरी से ही हाथ धोना पड़ता।

मेम साहब को एक शौक़ और था, तरह तरह के काकभगोड़े (scarecrow) बना कर उन्हें अपने इस  बंगले के खेत में लगाना। यह काकभगोड़े कम रावण के पुतले ज़्यादा नज़र आते थे, लगता था जैसे रावण, कुम्भकर्ण और मेघनाद वहाँ हमेशा मौजूद थे। पर मजाल है कि उनके इस अजीब से शौक़ के बारे में कोई कुछ भी मज़ाक़ कर सके, इसलिए आगंतुक हमेशा इस नायाब शौक़ की तारीफ़  करते ना अघाते थे।



बंगला
भी अंगेजों के  समय का ही था, आलीशान क़रीब बीघा ज़मीन पर, बाक़ी अफ़सरों की कालोनी से हट के। सरकार नहीं चाहती थी कि जज साहब, जनता जनार्दन या बाक़ी अफ़सरों से ज़्यादा मिले जुलें; और सरकार का यह आदेश तो सर आँखों पर सभी अफ़सर रखते थे, अंग्रेज़ी की कहावत है familiarity breeds contempt, अर्थात ज़्यादा मेल मिलाप रखने से आपकी इज़्ज़त  कम  हो जाती है। शासकीय सेवक होने और जनता के सेवक होने में फ़र्क़ था, क्योंकि जनता के सेवक  होने का दावा तो राजनेता ही कर सकते थे परंतु सेवा भाव दोनों में ही नदारद था।आख़िर  इतनी मुश्किल से माई बाप कहलाने का अधिकार मिलता है और वो भी इन गँवारों से मेलजोल बढ़ाकर गँवा दें यह कहाँ कि अक़्लमंदी है? इसलिए अधिकारी वर्ग इन्हें हमेशा उनकी जगह पर ही रखता था।

ख़ैर अभी तो उस बंगले के बारे में बात हो रही थी, तो बीघा ज़मीन को इस्तेमाल तो करना ही था आख़िर हमारे देश में इतनी भुखमरी जो थी, तो बक़ायदा वहाँ पर खेती होती थी, कुछ फलों के पेड़, जो पहले से ही वहाँ पर लगे हुए थे, उसके अलावा कुछ ताज़ी हरी सब्ज़ियाँ और थोड़ा बहुत चना और गेहूँ की भी क्यारियाँ थी।मेम साहब वीट ग्रास जूस पीती थी, तो उनके लिए यह भी इंतज़ाम किया गया था। फिर भी कुछ ज़मीन ऐसी थी जहाँ पर सिवाय घास के कुछ नहीं उगाया जा सकता था तो  उसे चारागाह सा ही रहने दिया था। यहाँ पर शुक्ला  परिवार के साथ उनका सम्बंध जुड़ा, वो ऐसे कि, हमारे यहाँ एक गाय थी, बहुत सुंदर, सफ़ेद मारवाड़ी नस्ल की, उसके सींग भी बिलकुल समानुपाती घुमावदार और मुँह तो साक्षात कामधेनु। उसके लिए हरे चारे की व्यवस्था करनी थी, तो शुक्ला जी  पहुँचे जज साहब के घर, की यदि उन्हें आपत्ति ना हो तो यह चारा वे उनकी  गाय के लिए ले जाना चाहते थे।जज साहब ने थोड़ी देर सोचा और फिर कहा १०० रुपए दीजिए और ले जाइए, शुक्ला जी  को लगा साहब मज़ाक़ कर रहे हैं और मुस्कुराते हुए  बोले हाँ हाँ अवश्य। जज साहब ने फ़रमाया आप इसे मज़ाक़ ना समझे, “आइ ऐम सीरीयस शुक्ला जी  ने उन्हें १०० रुपए अग्रिम जमा किए और गए। इत्तेफ़ाक से जज साहब का तबादला हो गया और उन्हें तुरंत जाना पड़ा, शुक्ला जी  फिर उनके पास पहुँचे की अब चूँकि वे जा रहे हैं, उन्हें उनके पैसे लौटा दिए जाएँ, पर उन्होंने आश्वासन दिया की उनकी जगह जो साहब रहे हैं वे यह चारा हमें ले जाने देंगे।शुक्ला जी  को भरोसा तो नहीं था पर जज साहब से कैसे उलझ सकते थे तो लौट आए, इस आशा के साथ कि शायद उन दोनों साहबों के बीच इस बारे में ज़रूर चर्चा होगी और उनकी  गाय इस चारे से वंचित नहीं होगी। 

नए साहब  श्री दिवाकर  जैन पधारे और शुक्ला जी  उनसे मिलने पहुँचे, वे  बड़ी गर्मजोशी से मिले, चाय पिलाई पर जैसे ही चारे के बारे में बात छिड़ी वे एकदम गरम हो गए और कहने लगे, यदि आपको यहाँ से चारा ले जाना है, तो १०० रुपए अब उन्हें देने होंगे। शुक्ला जी  ने बताया की  माथुर  साहब  को १०० रुपए अग्रिम जमा किए थे, और उन्होंने कहा था कि अब दुबारा पैसे देने की ज़रूरत नहीं है।जैन  साहब ने तल्ख़ी से कहा "फिर आप उन्ही से बात करें " १०० रुपए उस समय कोई मामूली रक़म भी नहीं थी और गाय के चारे का बंदोबस्त भी नहीं हुआ था, तो  माथुर  साहब को पत्र लिखा गया और उनसे विनती की गयी की वे ही इस मसले का हल निकाले।उन्होंने  पत्र का उत्तर दिया कि उन्होंने इस बाबत जैन साहब को पत्र लिख दिया है, शुक्ला जी  फिर बंगले पर पहुँचे  पर जैन साहब ने कहा हाँ मुझे पत्र प्राप्त हुआ और मैंने उनको इसका जवाब दे दिया है, पर चारा तो आपको १०० रुपए जमा करने पर ही मिलेगा। माथुर साहब को फिर पत्र लिखा गया कि यदि मुनासिब  समझें तो १०० रुपए लौटा दें  ताकि जैन साहब को पैसे दे कर चारे का इंतज़ाम कर सके। पत्र का फिर उत्तर आया कि उन्होंने एक और पत्र जैन साहब को लिख दिया है, परंतु उस का भी कोई असर नहीं हुआ,  तीन महीने गुज़र चुके थे वहाँ घास  पीली पड़ने लगी थी और ना तो चारा ही मिला ना ही पैसे। शुक्ला जी  के सब्र का बाँध अब जवाब दे गया, उन्होंने माथुर साहब को लिखा कि चारा तो मिला नहीं और ना  ही  उसकी अब ज़रूरत है यदि वे ठीक समझे तो बस उन्हें पैसे लौटा दें।कुछ दिनों बाद १०० रुपए का मनी ऑर्डर गया, गाय के लिए चारा कहीं और से लाया गया और क़सम ली की अफ़सरों के चक्कर में ना ही पड़े तो बेहतर है।मज़ेदार बात यह है की बंगला सरकारी तो वहाँ  की उपज भी सरकारी और उससे होने वाली आमदनी भी सरकारी कोष में जमा होनी थी, परसरकारी सम्पत्ति तो आपकी अपनी है


सुयश शर्मा 





 





3 comments:

  1. सुयश, हिंदी में भी आपकी इतनी दक्षता का हमें अनुमान नहीं था।बहुत खूब 👍👍

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  2. Very well written Suyash ! Today, even the President of India has been tersery 'guided' ! Hoping for better times !

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