Tuesday, April 8, 2025

टैरिफ़ पे टैरिफ़

 तारीफ़  पे तारीफ़, तारीफ़ पे तारीफ़ अमेरिका के राष्ट्रपति श्री डॉनल्ड ट्रम्प महोदय भी परेशान हो गए थे, आख़िर कब तक कोई अपनी ही तारीफ़ सुनता रहेगा, उनके सलाहकारों ने उनके कान पका दिए थे। यह अलग बात है कि वे टैरिफ़ की बात कर रहे थे और हमारे प्रिय पोटस ने समझा ये इकतरफ़ा तारीफ़ की बात कर रहे हैं, और उन्होंने कहा हम अमेरिकन हैं हम लेते हैं  तो देना भी जानते हैं, तो कोई आश्चर्य नहीं कि  उन्होंने कहा जब हमारी तारीफ़ हो रही है तो हमें भी तारीफ़ करना चाहिए। दोनों पक्षों को बराबरी से मिलना चाहिए और यही है इस टैरिफ़ युद्ध का मूल कारण।अब कितनी तारीफ़ की बात निकली तो वो तो दूर तलक जानी ही थी,माननीय  ट्रम्प महोदय का आदेश हुआ हम बड़े हैं  तो जितनी हमारी तारीफ़ वे करते हैं  उसका आधा हम उन्हें दे देते हैं।

अब चाहे टैरिफ़ हो या तारीफ़ हो तो गया ही है, जब तक ट्रम्प जी समझ पाते इस टैरिफ़ और  तारीफ़ का अंतर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत।  बहरहाल बाक़ी की दुनिया तो शम्मी कपूर की तरह गा उठी है, “तारीफ़ करूँ क्या उसकी, जिसने तुम्हें बनाया!“ 

टैरिफ़ भी एक प्रकार की तारीफ़ ही है जो देश अपने प्रिय देशों से व्यापार के लिए लगाते हैं  जो जितना प्यारा हो उसे उसी अनुपात में टैरिफ़ की प्राप्ति होती है। पिछले तक़रीबन चार पाँच दशकों से चीन और अमेरिका का बहुत याराना रहा है, इतना गहरा की दोनों ने मिल कर ही रूस के टुकड़े कर दिए। आज जब अमेरिका को ऐसा लगने लगा की इस दोस्ती में कुछ और जोड़ा जाए तो फिर,  कारोबार में घोली जाए  थोड़ी टैरिफ़ की मिठास, तो होगा जो नशा यूँ तैयार वो व्यापार हैवाह वाह क्या बात है…… 

व्यापार में ऊँच नीच तो चलती रहती है तो इस टैरिफ़ नुमा  तारीफ़ से क्या डरना, चीन ने भी अपनी मोहब्बत का इज़हार कुछ इसी अन्दाज़ में पूरे उत्साह के साथ अपने टैरिफ़ लगा कर किया है।बाक़ी देश भी इस खेल में पीछे नहीं रहना चाहते हैं आख़िर उनका की भी तो कुछ रसूख़ है तो कनाडा और यहाँ तक कि  मेक्सिको ने भी अपनी ओर से थोड़ा थोड़ा सहयोग कर ही दिया।हाँ भारत थोड़ा हिचकिचाता हुआ सा नज़र आता है, इस सोच में है की वैसे ही पहले मनमोहन जी जॉर्ज बुश (2008 ओवल ऑफ़िस) की और मोदी जी ट्रम्प जी की काफ़ी तारीफ़ों के पुल बाँध  चुके हैं। तो ऐसे में अब टैरिफ़ के भी चक्कर में कौन पड़ें

व्यापार एक बोर्ड गेम है जिस से अंग्रेज़ और हमारे देसी अंग्रेज़ मनॉपली(monopoly) के नाम से वाक़िफ़ हैं। आप सभी ने बचपन में खेला होगा और कुछ शहर हवाई अड्डे होटेल आदि ख़रीदे और बेचे होंगे, कुछ किराए पर दिए होंगे बैंक से और क़र्ज़ भी लिया होगा। खेल में मज़ा भी आता था ख़ास तौर से, जब सामने वाला दिवालिया हो जाता था, अभी भी ये दुनिया का व्यापार ही तो है। जीतने का मज़ा तभी है जब विरोधी देश भी  इसी तरह मुफ़लिस हो जाएँ।

एक और बात, टैरिफ़ यानीकर”, “करशब्द में ही कर्म छिपा है, संस्कृत में कर का अर्थहाथहोता है तो हाथों से ही ट्रम्प जी ने हस्ताक्षरकरके हम सभी को कर्मयोगी  बनने की प्रेरणा ही तो दी है, हमें तो उनका आभारी होना चाहिए।



9 comments:

  1. Tariff ho ya taarif dono hi mehenga padega sabko

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  2. तारीफ़ की बदौलत ट्रम्प सत्ता तो नहीं चला सकता ! दुनिया में मुफ़्तख़ोरी बहुत नहीं चलेगी! सब के अपने अपने सपने हैं, अपनी अपनी मजबूरियाँ ! ये सब ट्रम्प लोगों से अपनी बात मनवाने के लिए भी कर रहा है ! इस उठापटक का असर जल्द ही दिखेगा ! सबको अपनी कमर कसने की जरूरत पड़ेगी !

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  3. शब्दो से खेलना कोई आपसे सीखे l सहज भाव से तारीफ और टरिफ में जनमानस को सरलता से यह व्यंग्यात्मक लेख चुस्कियों और चुटकियां में ही पढ़वा दिया l अद्भुत क्षमता के धनी हैं हमारे मित्र 👌👍

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  4. बाँध दिए तारीफ़ के पुल,
    सानी नहीं है आपका,
    लिखते हैं क्या बाक़माल,
    ध्यानी नहीं कोई आपसा !!

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  5. इतना सुंदर व्याख्यान आप ही कर सकते हो वर्ना ट्रंप की कोई क्या तारीफ करे. तुसी ग्रेट हो जी😀😀

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  6. Dear Sir,
    Your satirical piece on tariffs and trade wars is a masterful blend of humor, wit, and cultural references. Your writing stands out for its witty observations, engaging storytelling, and thought-provoking themes.

    The comparison of tariffs to praise is a clever way to highlight the absurdity of trade wars, showcasing the author's ability to simplify complex economic concepts. The use of Bollywood references, such as Shammi Kapoor's song, adds a touch of humor and lightheartedness to the narrative.

    The text effectively uses storytelling to make complex economic concepts more relatable and entertaining, drawing the reader into the world of international trade. The analogy of trade to the board game Monopoly is particularly effective in illustrating the competitive nature of global commerce.

    The incorporation of cultural references, such as Sanskrit words and Bollywood songs, adds depth and nuance to the narrative, showcasing the yours creativity and cultural awareness. The use of Hindi phrases and idioms adds a unique flavor to the writing, making it more engaging and accessible to readers familiar with the language.

    The text raises important questions about the nature of trade relationships and the impact of tariffs on global economies, encouraging readers to think critically about the complexities of international trade. Your commentary on the role of leadership in shaping trade policies is particularly insightful, highlighting the significance of vision and strategy in navigating the complexities of global commerce.

    Your writing is both informative and entertaining, making complex trade concepts accessible to a wide audience. I appreciate your creativity in using satire to explain serious economic issues, adding a unique perspective to the narrative. Your use of cultural references adds a touch of elegance to the writing, making it a delightful read.

    Lt Col V Anandan(Retd)

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  7. बहुत ही उम्दा लेखन। शब्दों का ताल मेल और उनको लेख में व्यंग्यात्मक ढंग से पिरोना कोई आपसे सीखे । लिखते रहिए ।

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  8. एक दीर्घ अंतराल के बाद आप का हिन्दी में व्यंग लेखन पढ़ कर प्रसन्नता हुई। लोग तारीफ के पुल बांधते हैं पर इस पुल में पाये नहीं होते हैं और ये कभी भी धराशाई हो जाते हैं।

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  9. ये बे सिर पैर वाली जो बात है, बातों का आनंद तो उसी में है। ये टैरिफ़ और तारीफ़ का घाल मेल भाई तुमने अच्छा पकाया है। मुझे तो लगता है श्रीमान ट्रम्प जी ने गीता का श्लोक “कर्मण्ये वाधिका रस्ते …” कंठस्थ कर रखा है और उसका अर्थ ये समझा है कि कर मन की तो सब बढ़िया रहेगा।

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