घूसखोरी या रिश्वत या आज की भाषा में कहें तो कंसल्टेशन / फेसिलिटेशन फ़ी, इस तरह हमारे रग रग में समा गई है कि अब अपवाद भी नज़र नहीं आते हैं। रिश्वत तो पहले भी ली जाती थी, पर तब इस बेइमानी में भी ईमानदारी थी, वो ऐसे कि जब कुछ ऐसे काम सरकार के मार्फ़त कराना होते थे जो लीक से हटके होते थे या फिर नियमों को तोड़ मरोड़ कर करना हो तब अधिकारी वर्ग उसे नज़रंदाज करने के लिए अपना हिस्सा माँग लिया करते थे। घूसखोर अफ़सर समाज में छुप छुप कर ये काम करते थे, डरते थे कि कही यह ख़बर फैल गई तो समाज में उठना बैठना मुश्किल हो जाएगा, या यूँ कहें तो हुक्का पानी बंद हो जाएगा। मुझे याद है हमारे एक परिचित सिंचाई विभाग में अधीक्षण यंत्री के पद पर विराजमान थे, अब सिंचाई विभाग तो रुपयों की खान की तरह होता था उन दिनों, जिसकी जितनी श्रद्धा उतना मेवा उसे प्राप्त होता था। उनके बारे में प्रचलित था की कभी कभी तो ठेकेदार महोदय को पूरे पैसे न लाने पर जो चाय मेहमानवाज़ी के तौर पर पेश की जाती थी वो वापस रखवा ली जाती थी कि जब पूरे पैसे ले कर आओगे तब चाय पी लेना। घर में रखे फ़्रिज को सफ़ेद कोठी कह कर आगंतुक को बेवक़ूफ़ बनाने का असफल प्रयास करना या अपनी फ़ीयट गाड़ी किसी और के नाम पर ख़रीदना और कहना अभी हमारे पास छोड़ गए हैं , कुछ प्रचलित तरीक़े थे कि खुल्लम खुल्ला उन पर कोई भ्रष्टाचार का आरोप ना लगा सके। यह अलग बात है शहर में सभी असलियत से वाक़िफ़ थे और उनके कारनामों की चर्चा तो स्थानीय अख़बारों में आए दिन छपती रहती थी। इन अख़बारों का वितरण भी शहर की सीमाओं तक ही सीमित ही रहता था। अख़बार इस व्यवहार में अपना हिस्सा चाहते थे , हिस्सा मिलते ही ख़बर गधे के सर से सींग की तरह ग़ायब हो जाती थी, जब तक अगला आसामी हाथ ना आ जाए।
फिर भी अच्छे दिन थे एक तो इन जैसे अफ़सरों की संख्या काफ़ी कम थी और आँख की शर्म भी थी । पर अब तो कुएँ में ही भांग घुल चुकी है, अब चिराग़ ले कर ढूँढने पर भी ईमानदार अफ़सर शायद ही मिले। अब अफ़सर डंके की चोट पर, सरे आम इसे अंजाम देते हैं।घूस शब्द कुछ ऐसा है कि इसकी तुक में भी कुछ ऐसे ही और भी नगीने हैं जैसे 'ठूँस' या फिर 'मूस' और 'रूस'। घूस भी ठूँस ही कर खाई जाती है, इतनी की जिसमें ना सिर्फ़ क़ुटुम्ब ही समाए पर पूरा गाँव ही समा जाए । पेट पूजा भी ठूँस कर, और जेब पूजा भी ठूँस कर, हमारे देशवासियों की ठूसने की आदत भी वैसी ही है जैसे कि एक "मूस" की होती है ।मूस गाँव देहात में बड़े से चूहों को कहा जाता है जो आपकी पोटली में छेद कर माल चट कर जाता है। ठीक वैसे ही ये घूसखोर सरकारी ख़ज़ाने में और आपकी जेब में सेंध लगाते हैं । यदि आपने घूस देने में आनाकानी की तो ये “रूस” जाते हैं और आपके काम में हज़ारों तरीक़े की अड़चन पैदा कर देते हैं। फिर आपके पास कोई और चारा रह ही नहीं जाता और उन्हें मनाने के लिए आप मज़बूर हो जाते हैं उनकी जेब गरम करने के लिए अपनी जेब हल्की करनी ही पड़ती है। हाँ यह बात ज़रूर है कि कुछ नेता गण तो इस चारे को भी नहीं छोड़ते हैं और करोड़ों के घोटाले कर डालते हैं। हमारे देश की विडम्बना तो देखिए इन घोटालों में दोषी पाए जाने पर भी वे ना सिर्फ़ जनता द्वारा चुने जाते हैं वरन मंत्री भी बनते हैं और जब जेल भी जाते हैं तो हम सब पर अहसान ही करते हैं। राजा और प्रजा दोनों ही खाने खिलाने में विश्वास रखते हों तो फिर उन्हें चुनने में आख़िर हर्ज़ ही क्या है!
अब लोग अपनी हैसियत के मुताबिक़ यदि खाते पीते रहें तो मज़े में रहते हैं, समाज में इज़्ज़तदार बने रहते हैं, गाड़ी बंगला रुपया पैसा बैंक बैलेन्स और “माँ” भी बड़े ही ठसक से रहती है।पर यह भूख तो ऐसी होती है की कभी मरती ही नहीं है अंधे कुएँ के समान जितना भी डालो कम ही पड़ता है। इसीलिए कभी कभी अपच हो जाना लाज़मी है, फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है की इस अपच से दिक़्क़त सरकार को ज़्यादा होती है और रोगी को तभी पता चलता है जब अचानक सी बी आई या ई डी का घर पर छापा पड़ता है। अब अधिकारी वर्ग को तो मनाना ही पड़ता है इसलिए उसी कुएँ में से उलेच कर अच्छा ख़ासा बंदर बाँट होता है, फिर कुछ दिन के लिए निलम्बन को स्वीकारा जाता है और थोड़े दिनों में सब ठीक हो जाता है।यह तो जीवन चक्र है फिर मुस्तैदी से अपने घूस-क्षेत्र में कूद पड़ते हैं आख़िर ये भी एक प्रकार का कुरुक्षेत्र ही तो है यहाँ कौरव और पांडव दोनों सरकारी मुलाजिम ही हैं हम जैसी आम जनता तो उस एक अक्षौहिणी सेना के समान हैं जिसे श्री कृष्ण ने दुर्योधन को महाभारत के युद्ध के समय दे डाली थी, जिसका संहार पांडवों के हाथों होना तय था।
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