एक थे नानूराम जी, ऊँचे क़द के, भरे पूरे बलिष्ठ शरीर के मालिक, हाथ में लठ लिए उनकी अलग ही छबी थी । कहने को तो वे कॉलेज के हॉस्टल में एक भृत्य (नौकर शब्द का प्रयोग तब भी वर्जित था) थे और वहीं पीछे अपनी एक झोपड़ी में अपने परिवार सहित रहते थे पर उनका रुवाब आस पास के सभी बंगलो के नौकरों में ख़ूब चलता था।हॉस्टल में भी ज़्यादातर आदिवासी लड़के ही रहते थे, और नानूराम जी से डर कर ही रहते थे, हालाँकि उन्होंने कभी किसी पर हाथ नहीं उठाया ना ही गाली गलौज की पर उनका व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था की लोग उनसे उलझने से बचते थे।उस पुराने से हॉस्टल में वो भी वहाँ के पुरातत्व का एक हिस्सा ही मालूम होते थे, छात्रावास किसी ज़माने में शायद एक शिकारगाह की तरह बनाया गया था, एक जहाज़ के आकार का , ऐसा लगता था जैसे समुद्र में एक विशालकाय जहाज़ लँगड डाल कर कुछ विश्राम के पल का पूरा फ़ायदा सा उठा रहा है। हवा बंगले के नाम से मशहूर 'यथा नाम तथा गुण' को चरितार्थ सा करता था, क्योंकि वहाँ हवा कुछ ज़्यादा ही चलती थी। इतिहास गवाह था जब से ये शिकारगाह छात्रावास बना था नानूराम जी तब से यहीं थे, कितने ही वॉर्डन आए और गए पर वो वहीं बने हुए थे जैसे वो वहीं का एक हिस्सा हों।
नानूराम जी डरते किसी से नहीं थे पर साँपों से उनकी कुछ ज़्यादा ही दुश्मनी थी, पिताजी नए नए वॉर्डन नियुक्त हुए थे, हम तब छोटे बच्चे ही ही थे और सुबह की चाय का आनंद ले रहे थे, कि तभी नानूराम जी वहाँ अवतरित हुए, अपने लठ पर एक साँप को लटकाए हुए । "साहब यह कल रात अपने हवा बंगले में घुसने की कोशिश में था , मैंने देख लिया और तुरंत चित कर दिया, तक़रीबन ३ साढ़े ३ फूट का है , कोबरा है , बहुत ज़हरीला है पर मैंने भी बहुत देखे हैं " पिताजी बोले,"वो तो ठीक है पर सुबह सुबह इसे ले कर हमें दिखाने क्यों आ गए, वैसे ही बता देते "। उन्होंने कहा "अरे फिर आप को कैसे अन्दाज़ होता की यहाँ कैसे कैसे जानवर हैं, साँप बिच्छु यहाँ अक्सर निकल आते हैं बढ़ा ध्यान रखना पड़ता है "। कॉलेज में पूछने पर पता चला कि नानूराम जी ऐसे कई वॉर्डन लोगों को चलता कर चुके हैं , आख़िर क्यों कोई भला आदमी अपने परिवार की जान जोखिम में डालेगा इन साँप बिच्छु के बीच रह कर।पिताजी पर इसका कोई असर नहीं हुआ और वो समझ गए कि नानूराम जी हैं तो ख़ास और उन्हें थोड़ा अलग तरह से काम पर लगाना पड़ेगा । थोड़े दिनों में वे और उनका परिवार हमारे परिवार के आदी हो गए और ख़ुद हो कर हमारे छोटे मोटे काम करने लगे। एक दिन अचानक उन्होंने पिताजी को बताया की पिछले रविवार को वे हाट बाज़ार गए थे और वहाँ उन्हें एक गाय बहुत पसंद आयी । बोलने लगे हमें वो गाय ले आनी चाहिए , पिताजी ने कहा गाय तो ले आएँ पर उसे सम्भालेगा कौन, हमारे यहाँ तो किसी को भी इसका कोई अनुभव नहीं था। वे तपाक से बोले ,"मैं रखूँगा आप बिलकुल चिंता ना करें "।गाय आ गयी , हम बच्चों का भी इसमें योगदान था, हमारी गुल्लक के पैसे भी जोड़े गए थे, ६०० रुपए कोई कम रक़म नहीं थी उस ज़माने में। गाय सच में बहुत सुंदर थी, उसका एक छोटा सा बछड़ा भी था, गाय का नाम रखा गया दुर्गा और बछड़े का दुर्गनंदन, प्यार से हम उसे नंदू बुलाते थे। शुद्ध गाय का दूध सीधे गाय के थन से पीने का आनंद ही अलग है और मैंने उसका भरपूर मज़ा लिया । नानूराम जी भी गाय का बहुत ध्यान रखते थे, खली कपास्या हरा चारा भूसा हमेशा उसकी तगारी में होता था । थोड़े ही दिनों में नानूराम जी ख़ुद के लिए भी एक गाय ख़रीद लाए, अब दोनों गायों के खाने पीने का इंतज़ाम हमारे यहाँ से ही होने लगा, इसे वो चोरी नहीं मानते थे।गाय को खिलाने से पुण्य ही मिलता है तो वे हमें एक तरह से और पुण्य कमाने का मौक़ा ही दे रहे थे।
एक दिन कॉलेज के सामने एक हत्याकांड हो गया, नानूराम जी उसके प्रत्यक्ष गवाह थे, और भी बहुत सारे लोग वहाँ मौजूद थे पर जैसा अक्सर होता है, ऐसे समय सभी कन्नी काट लेते हैं, कौन कोर्ट कचहरी के चक्कर में पड़े, पर नानूराम जी अलग ही मिट्टी के बने थे। उन्होंने थाने में तफ़तीश के दौरान अपनी गवाही ना सिर्फ़ दर्ज ही करी पर कोर्ट में भी जा कर अपनी गवाही दोहरायी। हाँ ये अलग बात है की उन दिनों वे अक्सर अपने फरसे और लाठी के साथ ही नज़र आते थे, उन्हें दूसरी पार्टी की ओर से काफ़ी धमकियाँ मिल रही थी। पहले तो उन्हें ख़रीदने की कोशिश की गई , एक ग़रीब भृत्य के लिए पैसे का लालच काफ़ी स्वाभाविक था पर ये उनके उसूलों के ख़िलाफ़ था। भील आदिवासी निडर होते हैं और कई बार थाने में जा कर ख़ुद ही अपने गुनाहों के बारे में बता आते हैं। छोटी मोटी चोरी करना उनकी फ़ितरत मानी जाती है पर आधुनिकता का झूठ का जामा उन लोगों पर तब तक चढ़ा नहीं था।
मेरा यह विश्वास है कि सभी को बचपन में गाँव में रहने का मौक़ा मिलना चाहिए, बड़े होने पर गाँव का यह अनुभव उन्हें बहुत काम आएगा। शहर में रहने वाले ज़मीन से इस तरह जुदा हो जाते हैं कि उन्हें ये भी पता नहीं रहता है की आलू पेड़ पर लगते हैं या ज़मीन के नीचे।आप शायद सोच रहे होंगे क्या फ़र्क़ पड़ता है पर वास्तव में यह हमें ना सिर्फ़ ज़मीन से जोड़ती है पर हमें हर तरीक़े से एक बेहतर इंसान बनाती है । ख़ैर समय का पहिया तो किसी के लिए रुकता नहीं है, तो हम भी वहाँ से कुछ सालों बाद रुख्सत हो गए सिर्फ़ यादें रह गई । अब तो ना नानूराम जी ही रहे ना ही वो भव्य हवा बंगला, सुनने में आया है की पहले उसे खंडहर बना दिया गया फिर उसे नेस्तनाबूद कर वहाँ अब एक सब्ज़ी मंडी बन गयी है।
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