मुझे भी चाहिए नोबेल शांति पुरस्कार, अरे भाई किसे नहीं चाहिए नोबेल पुरस्कार, हम तो आस लगा कर बैठे हैं कि कभी तो कोई हमारी भी सुध लेगा। अब चूँकि श्री डॉनल्ड ट्रम्प महोदय ने यह घोषणा कर ही दी है कि उनसे अधिक योग्य उम्मीदवार पुरस्कृत होने के लिए चिराग़ ले कर ढूँढने से भी नहीं मिलेगा, हम ने सोचा अभी सही समय है जब हम भी अपना दावा ठोक ही दें, नहीं तो बाद में पछताते रहेंगे। महामहिम ट्रम्प जी ने भारत- पाक और इस्राएल -सीरिया युद्ध रोकने में अपनी भूमिका की भूरि भूरि प्रशंसा की और क़िस तरह उन्होंने पूरी दुनिया को युद्ध की विभीषिकाओं से बचाया।अमेरिका के राष्ट्रपति महोदय वास्तव में पुरुष नहीं महापुरुष हैं देवता तुल्य हैं।
अब यह किसी के लिए शांति हो सकती है किसी के लिए क्रांति भी हो सकती है पर वास्तव में सिर्फ़ एक भ्रांति ही है।शांति तो जीवन में सिर्फ़ एक ही बार मिलती है, हाँ भाई वही मरघट में, बाक़ी तो सब माया है, जीवन की आपा धापी में कहाँ कभी किसी को शांति मिली है। इसे खोजने तो सिद्धार्थ को जंगल प्रस्थान करना पड़ा था और शांति तब भी उन्हें नसीब नहीं हुई, वो तो तब ही मिली जब वे गौतम बुद्ध बन गए। ख़ैर यह फ़लसफ़ा कभी और, अभी तो ज़रूरी है की अपनी दावेदारी के साक्ष्य में मैं कुछ ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करूँ जिसे देख कर किसी के भी मन में कोई शंका नहीं रह जाए। आज ही की बात है सुबह सवेरे जब टहलने गया तो कुछ श्वान अपने ही एक जाति बंधु के पीछे पड़े हुए थे, अब हम ठहरे शांति दूत आख़िर महात्मा गांधी के देशवासी होने पर इतना तो हमारा कर्तव्य बनता ही था की उस स्थिति में शांति स्थापित करने का प्रयास करें।आप लोग तो ज्ञानी हैं जानते ही हैं की इस कुत्ता फजीती में पड़ना कितना ख़तरनाक हो सकता है, आप तो भलमनसाहत में कोशिश करते हैं पर युद्ध पर आमादा दोनों पक्ष आप पर ही टूट पड़ते हैं। ख़ैर लहूलुहान तो हुए, पर झगड़ा उस समय तो निपट ही गया क्योंकि वो आपसी लड़ाई को भूलकर मुझ पर जो टूट पड़े, तो तकनीकी तौर पर शांति तो स्थापित हो ही गई।ऐसे कई उदाहरण हैं मेरे पास, जब भी घर में महाभारत की नौबत आती है तो मैं भगवान कृष्ण की तरह तुरंत रणछोड़ देता हूँ, आख़िर यह कला हमें अपनी धार्मिक विरासत में मिली है। अब चूँकि आप विरोधी पक्ष को मौक़ा ही नहीं देते हैं तो शांति स्वयं ही अपना रास्ता ढूँढ लेती है।
वैसे इन दिनों शांति कहीं खो सी गई है। देखिए ना रूस-यूक्रेन, इज़राएल-हमस, इज़राएल-ईरान, कम्बोडिया-थाईलैंड, भारत-पाकिस्तान सभी देशों में शांति गुम है। क्या करती बेचारी जब सभी उपाय व्यर्थ हो गए तो थक हार कर उसने सोचा कि कहीं मुँह छुपा कर रो लेती हूँ, शायद मेरी अनुपस्थिति किसी को कभी तो खलेगी।अब चली तो वे गयी पर यहाँ कौन उन्हें मनाने जा रहा है, सभी अपना अपना राग अलाप रहे हैं। मूनीर जी तो आधी दुनिया ही साथ ले कर जाने की धमकी देते फिर रहे हैं, वैसे पाकिस्तान तो शुरू से ही एक ही मंत्र का जाप करता रहा है, ‘हम तो डूबेंगे सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे’, ये अलग बात है की यह उनकी ख़ुशफ़हमी ही है क्योंकि हम यह अच्छी तरह समझ चुके हैं की ‘लातों के भूत बातों से नहीं मानते’। शांति की डगर बड़ी कठिन है, आग से गुज़रना पड़ता है और जब तक सामने वाले पक्ष को यह समझ ना आए तब तक शांति के लिए कुछ क्रांति की ज़रूरत पड़ती ही है।
ख़ैर हम तो तो नोबेल पुरस्कार के बारे में बात कर रहे थे , तो जहाँ ट्रम्प महोदय अभी तक तो सफल नहीं हो पाए हैं वहीं दूसरी तरफ़ हम हैं, सफलता हमारे क़दम चूम रही है तो निर्णय आपके हाथ में है पाठकों, एक नया पुरस्कार तो हमारे लिए भी बनता है ‘नोबेल भ्रांति पुरस्कार’!
आप निश्चित रूप से पुरस्कार प्राप्त करने हेतु योग्यतम व्यक्ति हैं।हमारी कामना है कि यह पुरस्कार आप को शीघ्रातिशीघ्र मिले।
ReplyDeleteअंग्रेजी और हिंदी में आप समान रूप से दक्ष हैं। शुभकामनाएं।