Sunday, June 1, 2025

नानू राम जी

 एक थे नानूराम जी,  ऊँचे क़द के, भरे  पूरे  बलिष्ठ शरीर के मालिक,  हाथ में लठ लिए उनकी अलग ही छबी थी । कहने को तो वे कॉलेज के हॉस्टल में एक भृत्य (नौकर शब्द का प्रयोग तब भी वर्जित था) थे  और वहीं पीछे अपनी एक झोपड़ी में अपने परिवार सहित रहते  थे पर उनका रुवाब आस पास के सभी बंगलो के नौकरों में ख़ूब चलता था।हॉस्टल में भी ज़्यादातर आदिवासी लड़के ही रहते थे, और नानूराम जी से डर कर ही रहते थे, हालाँकि उन्होंने कभी किसी पर हाथ नहीं उठाया ना ही गाली गलौज की पर उनका व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था की लोग उनसे उलझने से बचते थे।उस पुराने से हॉस्टल में वो भी वहाँ के पुरातत्व का एक हिस्सा ही मालूम होते थे, छात्रावास किसी ज़माने में शायद एक शिकारगाह की तरह बनाया गया था, एक जहाज़ के आकार का , ऐसा लगता था जैसे समुद्र में एक विशालकाय जहाज़ लँगड डाल कर कुछ विश्राम के पल का पूरा फ़ायदा सा उठा रहा है। हवा बंगले के नाम से मशहूर 'यथा नाम तथा गुण'  को चरितार्थ सा करता था, क्योंकि वहाँ हवा कुछ ज़्यादा ही चलती थी। इतिहास गवाह था जब से ये शिकारगाह छात्रावास बना था नानूराम जी तब से यहीं थे, कितने ही वॉर्डन आए और गए पर वो वहीं  बने हुए थे जैसे वो वहीं  का एक हिस्सा हों।

नानूराम जी डरते किसी से नहीं थे पर साँपों से उनकी कुछ ज़्यादा ही दुश्मनी थी, पिताजी नए नए वॉर्डन नियुक्त हुए थे, हम तब छोटे बच्चे ही ही थे और सुबह की चाय का आनंद ले रहे थे, कि  तभी नानूराम जी वहाँ अवतरित हुए, अपने लठ पर एक साँप को लटकाए हुए । "साहब यह कल रात अपने हवा बंगले में घुसने की कोशिश में था , मैंने देख लिया और तुरंत चित  कर दिया, तक़रीबन ३ साढ़े  ३ फूट का है , कोबरा है , बहुत ज़हरीला है पर मैंने भी बहुत देखे हैं " पिताजी बोले,"वो तो ठीक है पर सुबह सुबह इसे ले कर हमें दिखाने क्यों आ गए, वैसे ही  बता देते "। उन्होंने  कहा "अरे फिर आप को कैसे अन्दाज़ होता की यहाँ कैसे कैसे जानवर हैं, साँप बिच्छु यहाँ अक्सर निकल आते हैं बढ़ा  ध्यान रखना पड़ता है "। कॉलेज में पूछने पर पता चला कि  नानूराम जी ऐसे कई वॉर्डन लोगों को चलता कर चुके हैं , आख़िर क्यों कोई भला आदमी अपने परिवार की जान जोखिम में डालेगा इन साँप बिच्छु के बीच रह कर।पिताजी पर इसका कोई असर नहीं हुआ और वो समझ गए कि  नानूराम जी हैं तो ख़ास और उन्हें थोड़ा अलग तरह से काम पर लगाना पड़ेगा । थोड़े दिनों में वे और उनका परिवार हमारे परिवार के आदी  हो गए और  ख़ुद हो कर हमारे छोटे मोटे काम करने लगे। एक दिन अचानक उन्होंने पिताजी को बताया की पिछले रविवार को वे हाट बाज़ार गए थे और वहाँ उन्हें एक गाय बहुत पसंद आयी । बोलने लगे हमें वो गाय ले आनी चाहिए , पिताजी ने कहा गाय तो ले आएँ पर उसे सम्भालेगा कौन, हमारे यहाँ तो किसी को भी इसका कोई अनुभव नहीं था। वे तपाक से बोले ,"मैं रखूँगा आप बिलकुल चिंता ना करें "।गाय आ गयी , हम बच्चों का भी इसमें योगदान था, हमारी गुल्लक के पैसे भी जोड़े गए थे, ६०० रुपए कोई कम रक़म नहीं थी उस  ज़माने में। गाय सच में बहुत सुंदर थी, उसका एक छोटा सा बछड़ा भी था, गाय का नाम रखा गया दुर्गा और बछड़े का  दुर्गनंदन, प्यार से हम उसे नंदू बुलाते थे। शुद्ध  गाय का दूध सीधे गाय के थन से पीने का आनंद ही अलग है और मैंने उसका भरपूर मज़ा लिया । नानूराम जी भी गाय का बहुत ध्यान रखते थे, खली कपास्या हरा  चारा भूसा हमेशा उसकी तगारी में होता था । थोड़े ही दिनों में नानूराम जी ख़ुद के लिए भी एक गाय ख़रीद लाए, अब दोनों गायों के खाने पीने का इंतज़ाम हमारे यहाँ से ही होने लगा, इसे वो चोरी नहीं मानते थे।गाय को खिलाने से पुण्य ही मिलता है तो वे हमें एक तरह से और पुण्य कमाने का मौक़ा ही दे रहे थे।

एक दिन कॉलेज के सामने एक हत्याकांड हो गया, नानूराम जी उसके प्रत्यक्ष गवाह थे, और भी बहुत सारे लोग वहाँ मौजूद थे पर जैसा अक्सर होता है, ऐसे समय सभी कन्नी काट लेते हैं, कौन कोर्ट कचहरी के चक्कर में पड़े, पर नानूराम जी अलग ही मिट्टी के बने थे। उन्होंने थाने में तफ़तीश के दौरान अपनी गवाही ना सिर्फ़ दर्ज ही करी पर कोर्ट में भी जा कर अपनी गवाही दोहरायी। हाँ ये अलग बात है की उन दिनों वे अक्सर अपने फरसे और लाठी के साथ ही नज़र आते थे, उन्हें दूसरी पार्टी की ओर से काफ़ी धमकियाँ मिल रही थी। पहले तो उन्हें ख़रीदने की कोशिश की गई , एक ग़रीब भृत्य के लिए पैसे का लालच काफ़ी स्वाभाविक था पर ये उनके उसूलों के ख़िलाफ़ था। भील  आदिवासी निडर होते हैं और कई बार थाने में जा कर ख़ुद ही अपने गुनाहों के बारे में बता आते हैं। छोटी मोटी  चोरी करना उनकी फ़ितरत मानी जाती है पर आधुनिकता का झूठ का जामा उन लोगों पर तब  तक चढ़ा नहीं था।

मेरा यह विश्वास है कि  सभी को बचपन में गाँव में रहने का मौक़ा मिलना चाहिए, बड़े होने पर गाँव का यह अनुभव उन्हें बहुत काम आएगा। शहर में रहने वाले ज़मीन से इस तरह जुदा हो जाते हैं कि  उन्हें ये भी पता नहीं रहता है की आलू पेड़ पर लगते हैं या ज़मीन के नीचे।आप शायद सोच रहे होंगे क्या फ़र्क़ पड़ता है पर वास्तव में यह हमें ना सिर्फ़ ज़मीन से जोड़ती है पर हमें हर तरीक़े से एक बेहतर इंसान बनाती  है । ख़ैर समय का पहिया तो किसी के लिए रुकता नहीं है, तो हम भी वहाँ से कुछ सालों बाद रुख्सत  हो गए सिर्फ़ यादें रह गई । अब तो ना नानूराम जी ही रहे ना ही  वो भव्य हवा बंगला,  सुनने में आया है की पहले उसे खंडहर बना दिया गया फिर उसे नेस्तनाबूद कर वहाँ अब एक सब्ज़ी मंडी बन गयी है।

घूस क्षेत्र

 घूसखोरी या रिश्वत या आज की भाषा में कहें तो कंसल्टेशन / फेसिलिटेशन फ़ीइस तरह हमारे रग  रग में समा गई है  कि  अब अपवाद भी नज़र नहीं आते हैं।  रिश्वत तो पहले भी ली जाती थी, पर तब इस बेइमानी में भी ईमानदारी थी, वो ऐसे कि जब कुछ ऐसे काम सरकार के मार्फ़त कराना होते थे जो लीक से हटके होते थे या फिर नियमों को तोड़ मरोड़ कर करना हो तब अधिकारी वर्ग उसे नज़रंदाज करने के लिए अपना हिस्सा माँग लिया करते थे।  घूसखोर अफ़सर समाज में छुप छुप कर ये  काम करते थे, डरते थे कि कही यह ख़बर फैल गई तो  समाज में उठना बैठना मुश्किल हो जाएगा, या यूँ कहें तो हुक्का पानी बंद हो जाएगा। मुझे याद है हमारे एक परिचित सिंचाई विभाग में अधीक्षण यंत्री के पद पर विराजमान थे, अब सिंचाई विभाग तो रुपयों की खान की तरह होता था उन दिनों, जिसकी जितनी श्रद्धा उतना मेवा उसे प्राप्त होता था। उनके बारे में प्रचलित था की कभी कभी तो ठेकेदार महोदय को पूरे पैसे   लाने पर  जो चाय मेहमानवाज़ी के तौर पर पेश की जाती थी वो वापस रखवा ली जाती थी कि  जब पूरे पैसे ले कर आओगे  तब चाय पी लेना। घर में रखे फ़्रिज को सफ़ेद कोठी कह कर आगंतुक को बेवक़ूफ़ बनाने का असफल प्रयास करना या अपनी फ़ीयट गाड़ी किसी और के नाम पर ख़रीदना और कहना अभी हमारे पास छोड़ गए हैं , कुछ प्रचलित तरीक़े थे कि  खुल्लम खुल्ला  उन पर कोई भ्रष्टाचार का आरोप ना लगा सके। यह अलग बात है शहर में सभी असलियत से वाक़िफ़ थे और उनके कारनामों की चर्चा तो स्थानीय अख़बारों में आए दिन छपती रहती थी। इन अख़बारों का वितरण भी शहर की सीमाओं तक ही सीमित ही रहता था। अख़बार इस व्यवहार में अपना हिस्सा चाहते थे , हिस्सा मिलते ही ख़बर गधे के सर से सींग की तरह ग़ायब हो जाती थी, जब तक अगला आसामी हाथ ना जाए। 

फिर भी अच्छे दिन थे एक तो इन जैसे अफ़सरों की संख्या काफ़ी कम  थी और आँख की शर्म भी थी    पर अब तो कुएँ में ही भांग  घुल चुकी है, अब चिराग़ ले कर ढूँढने पर भी ईमानदार अफ़सर शायद ही मिले। अब अफ़सर डंके की चोट पर, सरे  आम इसे अंजाम देते हैं।घूस शब्द कुछ ऐसा है कि इसकी तुक में भी कुछ ऐसे ही और भी नगीने हैं जैसे 'ठूँस' या फिर 'मूस' और 'रूस' घूस भी ठूँस ही कर खाई जाती है, इतनी की जिसमें ना सिर्फ़ क़ुटुम्ब  ही समाए पर पूरा गाँव ही समा जाए पेट पूजा भी ठूँस कर, और जेब पूजा भी ठूँस करहमारे देशवासियों की   ठूसने   की आदत भी वैसी ही है जैसे कि एक "मूस" की होती है मूस  गाँव देहात में बड़े से चूहों को कहा जाता है जो आपकी पोटली  में छेद कर माल  चट  कर जाता है।  ठीक वैसे ही ये घूसखोर सरकारी ख़ज़ाने में और आपकी जेब में सेंध लगाते हैं यदि आपने घूस देने में आनाकानी की तो येरूसजाते हैं और आपके काम में हज़ारों तरीक़े की अड़चन पैदा कर देते हैं। फिर आपके पास कोई और चारा रह ही नहीं जाता और उन्हें मनाने के लिए आप मज़बूर हो जाते हैं उनकी जेब गरम करने के लिए अपनी जेब हल्की करनी ही पड़ती है। हाँ यह बात ज़रूर है कि  कुछ नेता गण  तो इस चारे को भी नहीं छोड़ते हैं और  करोड़ों के घोटाले कर डालते हैं। हमारे देश की विडम्बना तो देखिए इन घोटालों में दोषी पाए जाने पर भी वे ना सिर्फ़ जनता द्वारा चुने जाते हैं वरन मंत्री भी बनते हैं और जब जेल भी जाते हैं तो हम सब पर अहसान ही करते हैं। राजा और प्रजा दोनों ही खाने खिलाने में विश्वास रखते हों तो फिर उन्हें चुनने में आख़िर हर्ज़  ही क्या है!

अब लोग अपनी हैसियत के मुताबिक़ यदि खाते पीते रहें तो मज़े में रहते हैं, समाज में इज़्ज़तदार बने रहते हैं, गाड़ी बंगला रुपया पैसा बैंक बैलेन्स औरमाँभी बड़े ही ठसक से रहती है।पर यह भूख तो ऐसी होती है की कभी मरती ही नहीं है अंधे कुएँ के समान जितना भी डालो कम ही पड़ता है। इसीलिए कभी कभी अपच हो जाना लाज़मी है, फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है की इस अपच से दिक़्क़त सरकार को ज़्यादा होती है और रोगी को तभी पता चलता है जब अचानक सी बी आई या डी का घर पर छापा पड़ता है। अब अधिकारी वर्ग को तो मनाना  ही पड़ता है इसलिए उसी कुएँ में से उलेच कर अच्छा ख़ासा बंदर बाँट होता है, फिर कुछ दिन के लिए  निलम्बन को स्वीकारा  जाता है और थोड़े दिनों में सब ठीक हो जाता है।यह तो जीवन चक्र है फिर मुस्तैदी से अपने घूस-क्षेत्र में कूद पड़ते हैं आख़िर ये भी एक प्रकार का कुरुक्षेत्र ही तो है यहाँ कौरव और पांडव दोनों सरकारी मुलाजिम ही हैं हम जैसी आम जनता तो उस एक अक्षौहिणी सेना के समान हैं जिसे श्री कृष्ण ने दुर्योधन को महाभारत के युद्ध के समय दे डाली थी, जिसका संहार पांडवों के हाथों होना तय था।