इंदौर शहर की यातायात व्यवस्था यानी ट्राफिक, दुनिया का आठवाँ अजूबा मान लिया जाना चाहिए। जब इस रोज़ रोज़ की आपाधापी में भी हमारे वाहन हमें बड़े प्यार से सुरक्षित गंतव्य तक पहुँचा देते हैं तब हमें उस परम पिता परमेश्वर पर न सिर्फ़ विश्वास हो जाता है बल्कि उसे धन्यवाद देते हुए नतमस्तक होने की इच्छा भी जाग्रत होती है। अब कल की ही बात लीजिए, शाम का समय था, अर्धांगनी का आदेश हुआ कि बाज़ार से सब्ज़ी तरकारी ले आकर आइए, यदि शाम को फ़ाका नहीं रखना है तो। अब भूखे पेट तो भजन भी नहीं होता है, तो हम भी आज्ञाकारी पति का फ़र्ज़ निभाते हुए तुरंत गाड़ी निकाल कर चल पड़े सब्ज़ी मंडी। घर से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही, रास्ते में हम, फँस गए ट्रैफ़िक जैम में ।
यहाँ जैम में घिर जाना कोई अनहोनी नहीं है, रोज़ ही किसी न किसी जैम से गुज़रना ही होता है, पर यह वाला थोड़ा अजूबा ही था। जब लगभग ५ मिनट तक सभी अपनी अपनी गाड़ियों के हार्न बजा कर अपनी अपनी गाड़ी के तरह तरह के भोंपू (हाँ भाई, हिंदी में हार्न को भोंपू ही कहा जाता है, अब यह भोंदू शब्द से मिलता जुलता है आगे आप लोग तो स्वयं समझदार हैं !) के कला प्रदर्शन से थक चुके थे और कोई अपनी जगह से टस से मस नहीं हो रहा था, तब मेरी आदर्श नागरिकता जाग्रत हुई और मैं अपनी गाड़ी से उतर कर ज़रा स्थिति का मुआयना करने निकल पड़ा। बस किसी तरह गाड़ियों के इस गड्ड मड्ड में चार क़दम चला था कि अपराधी गाड़ी सामने दिखाई दी, एक सफ़ेद रंग की मारुति डिज़ायर बीच सड़क में अड़ियल साँड़ की तरह विराजमान थी, वाहनचालक (ड्राइवर) नदारद, मेम साहब बग़ल वाली सीट पर महात्मा बुद्ध की तरह निर्विकार बैठी नज़र आई उनकी नज़र-ए-इनायत मोबाइल पर। अब ऐसी समाधि में लीन देवी के चिंतन मनन में विघ्न डालने में मन थोड़ा हिचकिचाया, कहीं ध्यान भंग होने पर, शिवजी की तरह तीसरा नेत्र खुल गया तो श्राप
का भागी न बन जाऊँ। पर आख़िर एक अनुशासित पूर्व सैनिक होने के नाते जान हथेली पर रख कर गाड़ी की खिड़की पर खटखटाने की हिमाक़त कर ही डाली। मेम साहब ने तिरछी नज़र से और भृकुटि सी तान कर मुझे देखा, मैंने गाड़ी का शीशा नीचे करने का इशारा किया, बराए मेहरबानी शीशा नीचे हुआ और जब उनसे कुछ झल्लाते हुए उनके ड्राइवर के बारे में पूछा तो उन्होंने सुलभ शौचालय की ओर इशारा किया। मैं तब भी समझ न पाया कि माजरा क्या है, तो उन्होंने कहा कि उन्हें अचानक जाना पड़ा था। अब प्रकृति के नियम से तो कोई लड़ नहीं सकता है, उन्हें कुछ ज़्यादा ही ज़ोर से लगी होगी, कि वे बीच रास्ते में गाड़ी छोड़ कर अपनी लघु या दीर्घ शंका निवारण के लिए कूच कर गए। गाड़ियों की चिल्लपों बक़ायदा जारी थी और अब प्रश्न यह था कि यदि उन सज्जन की गाड़ी हटाने गया तो मेरी गाड़ी को कौन हटाएगा, इसलिए उसे छोड़ बाक़ी दो पहिया वाहनों के चालकों से निवेदन किया गया कि वे भी थोड़ा सब्र करें और सड़क पर जगह बनाएँ ताकि एक काली थार जो मंझधार में फँसी नाँव की तरह दूसरी तरफ़ के ट्राफिक के लिए रुकावट का कारण बनी बैठी थी, उसे निकलने की जगह दी जा सके। तब तक लघु/दीर्घ शंका निवारण कर साहब भी वापस आ चुके थे और गाड़ियाँ फिर रेंगने लगी।यहाँ पर चौराहों पर कभी भूले से भी कोई ट्राफिक पुलिस का सिपाही नज़र नहीं आता है, वे जानते हैं कि यहाँ के नागरिक इन छोटी मोती कठिनाइयों से घबराने वाले नहीं हैं, वे अपना रास्ता ढूँढ़ ही निकालेंगे। दो पहिया वाहनों पर सवारियों की संख्या तीन या उससे अधिक रखना अनिवार्य है। आख़िर देश में ईंधन की इतनी समस्या है, तीन-चार या पाँच लोग यदि अलग अलग गाड़ी में जाएँगे तो पहले तो देश में तेल की खपत बढ़ेगी, जिसका सीधा असर हमारी अर्थ व्यवस्था पर होगा। दूसरा, वैसे ही इतने अधिक वाहन सड़क पर हैं, उसमें प्रत्येक द्विपहिया के स्थान पर दो या तीन वाहन की और वृद्धि हो जाए तो यहाँ तो यातायात ही ठप्प हो जाए। इसलिए वे अपनी जन हथेली पर रख कर देश और इंदौर शहर के लिए यह क़ुर्बानी करने में ज़रा भी नहीं हिचकते हैं। सर पर कफ़न बाँध कर सरफ़रोशी की तमन्ना से ही वे घर से निकलते हैं।उन्हें मैं सादर नमन करता हूँ और शहर के महापौर से निवेदन करता हूँ कि स्वच्छता के साथ शहर की अनूठी यातायात व्यवस्था को भी वैसा ही सम्मान दिलाने की चेष्टा अवश्य करें।
Nice one in Hindi too..
ReplyDeleteयातायात की अव्यवस्था सिर्फ इंदौर की ही अपनी नहीं है।नवाबों की नगरी भी इससे अछूती नहीं है। यातायात पुलिस ने जनहित में यहां चौराहों को शिलाखण्डों से इस प्रकार अवरोधित कर दिया है कि यात्री बाएं से निकल सकें,दिशा परिवर्तन में जो भी मशक्कत करनी पड़े।
ReplyDeleteThis is a serious problem in Hyderabad..people overtake you from any direction...even if you have given an indicator for turning..they will overtake you from the direction you have indicated to turn..every step is a challenge...
ReplyDeleteइस प्रकार की यातना तो देहरादून वासी भी झेल रहे हैं l यदि शहर का नाम नहीं लिखा होता तो मुझे लगता कि देहरादून की हालत बयान कर रहे हो l मुझे गर्व है अपने भारत पर कि इतना बड़ा देश, अलग अलग संस्कृति किन्तु सोच व आदतें एक. Unity in diversity. इस लेख को साझा करने के लिए धन्यवाद l
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