“खोदा पहाड़ निकली चुहिया” यह कहावत तो आपने सुनी ही होगी, शायद नगर निगम इंदौर ने नहीं सुनी है, तभी तो यहाँ पर पूरा इंदौर ही खोद दिया गया है। अब चुहिया तो वो खोजने से रहे, क्योंकि बारिश के इस मौसम में वैसे ही मूषक सम्प्रदाय ने घरों पर हमला बोला हुआ है। गणेश जी के वाहन हैं, इसलिए इन्हें रुसवा भी नहीं किया जा सकता है। तो इस खुदाई से वे कौन सी प्राचीन सभ्यता के अवशेष खोज रहे हैं यह तो वे ही जानें, क्योंकि यदि यही सिलसिला जारी रहा तो ज़रूर यहाँ भी कान्ह-सरस्वती सभ्यता के कुछ चिन्ह तो उन्हें मिल ही जाएँगे। मुझे दृढ़ विश्वास है कि खुदाई में यहाँ कढ़ाई और तसला आदि काफ़ी तादाद में मिलेंगे, आख़िर पोहे और जलेबी तो उस काल में भी यहाँ की प्रिय खुराक रही होगी। वैसे लगता है कि नगर निगम ने शायद कोई प्रतियोगिता रखी है कि कौन सा विभाग ज़्यादा खुदाई करेगा और उसे ज़्यादा समय तक करेगा।अभी तो सड़क निर्माण विभाग ही आगे नज़र आता है, फिर बिजली, पानी, इंटर्नेट सेवा प्रदान करने वाले या फिर सैनिटेशन भी इस दौड़ में शामिल हैं और बड़ी तेज़ी से इन सब से आगे निकलने का प्रयोजन करते दिख रहे हैं। अब खुदाई होगी तो ग़ड्डे तो होंगे ही, मिट्टी और पत्थर भी निकलेंगे, जब प्रशासन ने इन में से किसी का भी टेंडर निकाला था, तो सिर्फ़ खोदने का काम उसमें शामिल था, पर इस खुदाई से हुए ग़ड्डे को भरने की चूँकि कोई निविदा सूचना थी ही नहीं, इसलिए वह तो कार्यसूची में शामिल ही नहीं था। खोद तो उन्होंने तुरंत दिया, उसका पैसा भी वसूल कर लिया अब भरने की ज़िम्मेदारी तो उनकी है नहीं, आपने सुना ही होगा, ‘करे कोई भरे कोई’, इसे भी तो चरितार्थ करना है न। वैसे एक कहावत और मशहूर है कि जो दूसरों के लिए ग़ड्डे खोदते हैं, वो स्वयं उसमें गिर जाते हैं; यह तो यहाँ झुठलाई जा चुकी है। इनके द्वारा खोदे गए गड्डों में पता ही नहीं कितने बेचारे लोग गिर कर अपने हाथ पैर तुड़वा चुके हैं और कुछ ने तो अपनी जान तक गाँव दी है।
बचपन में एक बार मैं और मेरे भाई को भी खुदाई का शौक़ चर्राया, तब इस तरह सड़कें नहीं खुदी दिखती थी, नहीं तो शायद हम वहीं पर दो चार फावड़े चला कर अपना शौक़ पूरा कर लेते। हम उस समय एक पुरानी ऐतिहासिक इमारत में ही रह रहे थे, यह अलग बात है कि आज वह ज़मींदोज़ हो चुकी है, पर उस में हमारी खुदाई का कोई हाथ नहीं था, सच में । इतिहास में मोहन जोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई का पाठ नया नया पढ़ा था, तो हमने भी सोचा हम भी इंडीयना जोंस हैं और लगे गेती फावड़ा ले कर खोदने, दो चार फ़ीट खोदते खोदते हाथों में छाले पड़ने लगे, तब से ही हमें समझ आ गया था कि कितना कठिन काम कर रहे हैं ये निगम वाले।अब खुदाई तो ज़रूरी है, खनिज खनन हो या फिर कृषि, पहले ज़मीन तो खोदना ही पड़ती है तभी तो बीज रोपित किए जा सकते हैं। घर बनाना हो तो भी नींव खोदने से ही शुरुआत होती है, और आदमी का अंत भी तो क़ब्र खोदने से ही होता है। यहाँ तो आग लगती है तभी कुआँ खोदते नज़र आते हैं लोग। फिर ‘खुदाई’ लफ़्ज़ में ‘खुदा’ का नाम छिपा है, ऐसे में तो यह सबाब का काम हुआ, इसे ‘भर’ कर हम हराम भला कैसे कर सकते हैं। अब चाहे कीचड़ हो या कोई ग़ड्डे में गिरे, ऐसे धर्म के काम में तो हम सब का सहयोग वांछित ही है, क्यों भाईयों?
