“आपका पास्पोर्ट आपकी नागरिकता का प्रमाण नहीं है”, विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कुछ दिन पहले ही यह स्पष्टीकरण दिया था। अब पास्पोर्ट धारक तो हमारे देश में कुल जमा ५-६% लोग ही होंगे, और इनमे भी अधिकतर वे लोग हैं जिन्हें भारतीय नागरिकता से कोई प्रेम या गर्व नहीं है। कई तो अमरीका, यूरोप या आस्ट्रेलिया के नागरिक बनने के लिए उतावाले हैं। पर सबसे ज़्यादा खलबली उन्हें ही हुई है। ख़ैर, प्रश्न यह है कि फिर किसी भी व्यक्ति की नागरिकता का प्रमाण कौन से दस्तावेज़ के द्वारा किया जा सकता है?
हम जानते हैं कि जन्म प्रमाण पत्र सबूत के तौर पर मान्य है, पर पहली बात तो आज़ादी के पहले जन्मे अधिकतर लोगों का ऐसा कोई जन्म का रिकार्ड ही नहीं है क्योंकि अधिकतर जन्म घर में दाइयाँ ही कराती थी। साठ और सत्तर के दशक में जब जन्म प्रमाण पत्र बनने लगे तो उन में केवल माँ का नाम दर्ज़ होता था, लड़का/लड़की का नाम नहीं और वह इसलिए कि नामकरण संस्कार तो दो तीन सप्ताह बाद होता था और यह कार्रवाई तो जन्म के एक दो दिन में ही हो जाती थी। हालाँकि अब बच्चे के नाम के साथ ही प्रमाण पत्र जारी होते हैं।
हमारे देश में वैसे तो हम कई प्रकार के कार्ड धारक हैं, “आधार”, जो कि एक पहचान और स्थाई निवास का प्रमाण माना जाता है, “पैन कार्ड” आय कर के लिए, “मतदाता पहचान पत्र” (वोटर आइ डी) चुनावी प्रक्रिया के लिए, “ड्राइविंग लाइसेन्स”, वाहन चालन के लिए, “राशन कार्ड”, खाद्य सामग्री वितरण के लिए, पर इनमे से कोई भी आपकी नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्वीकार्य नहीं है। हमारे जैसे बंजारों वाला जीवन व्यतीत करने वाले फ़ौजियों के लिए तो यह और भी मुश्किल हो जाता है। न तो हमारा कोई स्थायी पता है, न ठिकाना, जब तक देश सेवा में लगे रहे तब तक परवाह नहीं की, अब जब हमसे हमारे होने का कोई सबूत माँगे तो हम लाजवाब हो जाते हैं। जीवन के साठ वर्ष यानी उतने ही मानसून, उतने ही वसंत इस भारत भूमि पर गुज़ारने के बाद, अब भी यदि हमें हमारी नागरिकता का प्रमाण देना हो तो हमें किस द्वार को खटखटाना है, यह जानना ज़रूरी है। हमारे जैसे और भी कई नौकरीशुदा मध्यम वर्गीय परिवार ऐसी ही चुनौती का सामना कर रहे होंगे। एन आर सी (NRC) यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर जो कि १९५५ के नागरिकता क़ानून के २००३ के संशोधन के द्वारा सरकार पूरा करने को बाधित है, वह ही इस अनबूझ पहेली का एकमात्र हल है।
जब २००३ से यह क़ानून है तो अभी तक इस पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं की गई, यह प्रश्न एक आम नागरिक के मान में उठना स्वाभाविक ही है। यहाँ पर इस बिल और रजिस्टर से राजनीति आ जुड़ी है। यदि यह रजिस्टर ईमानदारी से पूरा किया गया, तो यहाँ पर अवैध रूप से रह रहे विदेशी (ज़्यादातर बंगलादेशी) आप्रवासियों की शामत आ जाएगी। अब पिछले कुछ वर्षों में कुछ राजनीतिक दलों ने इन्हें अपरोक्ष रूप से बढ़ावा दिया और उन्हें आधार कार्ड, वोटर कार्ड आदि तमाम दस्तावेज़ मुहैया कराए गए, ताकि चुनावों में उन्हें वोट बैंक की तरह इस्तेमाल कर अपना उल्लू सीधा कर सकें। रजिस्टर पूरा हुआ तो इन सबकी पोल खुल जाएगी।
अब यदि मानवीय दृष्टिकोण से इस पर विचार किया जाए तो इन लाखों आप्रवासियों को हम खदेड़ भी नहीं सकते हैं, न ही हम इन्हें भारत की नागरिकता ही प्रदान कर सकते हैं। ऐसे में क्यों न इन्हें कार्य अनुज्ञा पत्र (वर्क पर्मिट) जारी कर इन्हें भारत में रहने की अनुमति दी जाए ताकि वे अपना भरण पोषण कर सकें, पर उन्हें नागरिकों के अधिकार से वंचित रखा जाए। कई राजनीतिक दल फिर भी नहीं मानेंगे क्योंकि उनका वोट बैंक चला जाएगा, पर इस तरह हम इस मानव संसाधन ( ह्यूमन रीसोर्स) का सही उपयोग कर पाएँगे ।
साथ ही आधार कार्ड को ही एक सार्वभौमिक दस्तावेज़ माना जाए, इस में बाक़ी सभी कार्ड्ज़ का समावेश किया जाए, पैन, ड्राइविंग लाइसेन्स, वोटर आइ डी आदि। आज के डिजिटल युग में यह कोई बहुत कठिन कार्य नहीं है, आधार कार्ड धारकों की एक एस आइ आर (SIR) करवाइए, अभी जनगणना के साथ ही इसे भी किया जा सकता है। इससे आधार सत्यापन भी हो जाएगा, फ़र्ज़ी दस्तावेज़ धारकों की धर पकड़ भी हो जाएगी। ज़रूरत है तो एक ईमानदार संगठन की, जो इसका ज़िम्मा ले सके। अध्यापकों को हर जगह इस्तेमाल करने के बजाय, पूर्व सैनिकों को ऐसे कार्यों में शामिल करें, उनमें देश और समाज की सेवा की भावना कूट कूट कर भरी हुई है, उन्हें ऐसे किसी भी राष्ट्रीय उद्यम में सहयोग कर ख़ुशी ही होगी।
क्या सेना में इतने वर्ष रह कर देश सेवा करने के बाद भी किसी प्रमाण की आवश्यक्ता है?
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