Sunday, July 5, 2026

तबादले का उद्योग

 सरकारी कर्मचारियों के लिए स्थानांतरण (ट्रान्स्फ़र) एक नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया है, ऐसा मैं समझता था, बच्चा जो था। हर सरकारी कर्मचारी के लिए एक जैसे नियम भी नहीं  होते हैं, जैसे शिक्षा विभाग में पूरे कार्यकाल में केवल दो या तीन बार ही यह मौक़ा आता है, परंतु जिले में ज़िलाधीश, पुलिस सूपरिंटेंडेंट आदि तो कई बार साल में दो-तीन बार भी जाना पड़ता है। अब यदि सरकारी अफ़सर स्थानीय  नेताओं को सुहाए तो उनका जाना तय ही माना जाता है। नेताओं की माँगे भी तो शैतान की आँत की तरह ख़त्म होने का नाम ही नहीं  लेती हैं। इन ज़मीन से जुड़े नेताओं को कभी  ऐसी ही किसी ज़मीन का टुकड़ा उन्हें रास जाता है तो कभी  रिश्तेदारों के लिए अवैध लाइसेन्स या पर्मिट का जुगाड़, कभी वैसे ही पैसे की भूख, जब अधिकारी वर्ग उनकी इन माँगों को पूरा करने में असमर्थ होते हैं तो स्वयं ही अपना सामान बाँध कर प्रस्थान की तैयारी कर लेते हैं। 


पर यह तबादला सिर्फ़ सज़ा के तौर पर या कार्यकाल पूरा होने पर ही नहीं  किया जाता है, कभी कभी कुछ भाग्यशाली प्रतिभाशाली अधिकारी कुछ ऐसे घोटाले कर डालते हैं तब स्थिति को सम्भालने के लिए और जनता का ध्यान हटाने के लिए भी यह क़दम उठाया जाता रहा है। अब कहीं पर दंगे फ़साद हो जाए, या कोई हादसा हो जाए   तो वहाँ के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को स्थानांतरित कर उन्हें सज़ा दी जाती है। भले ही उस हादसे या दंगे में जान -माल का काफ़ी नुक़सान हुआ हो, इस सब से उनकी सेहत पर कोई असर नहीं  होता है।सरकारी ख़र्चे पर उन्हें पूरी इज़्ज़त के साथ अपने नए पद और स्थान पर भेज दिया जाता है। अब इस से ज़्यादा क्या  बच्चे की जान लोगे, बेचारे अफ़सर का सब जमा जमाया खेल बिगड़ जाता है, नई जगह पर नए सिरे   से फिर शुरुआत करनी पड़ती है, एक नया सिस्टम बनाना पड़ता है। हर छूटभैये नेता के साथ जुगत बैठनी पड़ती है, क्योंकि यदि वे ख़ुश रहें तो फिर वे हर छोटी मोती बात को ले कर आपके सर हो जाएँगे। 


तबादले हम फ़ौजियों के भी होते हैं, औसतन हम भी किसी जगह - साल से ज़्यादा टिकते नहीं  हैं, पर हमें सज़ा के तौर पर यह अवसर कभी प्राप्त नहीं  होता है हमारी सज़ा तो सीधे सीधे कोर्ट मार्शल और यदि कोई छोटी मोटी  ग़लती होती है तो भी आपकी सी आर (ACR) में बक़ायदा इसका उल्लेख किया जाता है। पर  हमारे लिए तो एक तरह से ये स्थानांतरण एक वरदान जैसा लगता है। हमें और हमारे परिवार को  पूरा भारत और कभी कभी विदेश यात्रा का मौक़ा  मिलता  है, हर जगह का अपना  खान-पान, संस्कृति, पहनावा, भाषा, इस सब से वाकफ़ियत भी होती है, और इस सब से हम शायद और परिपक्व हो जाते हैं। हमारा दायरा संकुचित नहीं  रहता, “अनेकता में एकताको हम सही अर्थों में समझ पाते हैं। धर्म, जात-पात, भाषा, खान-पान जैसी चीज़ों में हम अपने से अलग विचारधारा के लोगों की सोच और  इच्छा का सम्मान करना भी सीख जाते हैं।


ख़ैर बात तो सज़ा के तौर पर तबादले की हो रही है, जब यह सज़ा सज़ा ही हो तो क्या आप सोचते हैं कि  इस से व्यक्ति विशेष में कोई सुधार की सम्भावना है? सज़ा देने के भी दो कारण होते हैं, एक तो दोषी को इसके किए का परिणाम और साथ ही विभाग में बाक़ी लोगों के पास भी संदेश पहुँचाना  की कर्तव्य में कोताही करने का फल भुगतना  पड़ेगा। यहाँ एक बात और काफ़ी दिलचस्प है, वह यह कि पिछले कुछ दशकों में स्थानांतरण स्वयं एक व्यवसाय की तरह बना दिया गया है,  जैसा अटल जी ने कहा था, सरकारें आएँगी जाएँगी लोकतंत्र चलते रहना चाहिए, वैसे ही तबादले भी होते रहेंगे।  यह एक ऐसा उद्योग है जिस में हींग लगे न फटकरी पर रंग चोख आए, चूँकि सरकारी पदों  के साथ ऊपरी कमाई जुड़ी होती है,तो हर पद  बिकता है, बोली लगाई जाती है। इसलिए हर साल तबादले का भी मौसम आता है, सरकारी अफ़सर उसकी तैयारी में लग जाते हैं, जाने के पहले उन्हें अपनी कमाई का लक्ष्य जो पूरा करना होता है। क्या पता कल जहाँ फँस जाएँ  वहाँ ऐसा मौक़ा ही मिले अब आप कहेंगे इस में नया क्या है, हम तो इस सब से पहले से ही वाक़िफ़ हैं, ईश्वर के बाद यही तो  शाश्वत सत्य है।




No comments:

Post a Comment