आप ने यह कहावत तो सुनी ही होगी “बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना”, राज कपूर की फ़िल्म “जिस देश में गंगा बहती है” के लोकप्रिय गाने का यही मुखड़ा भी है। दूसरे की ख़ुशी में खवामखाह जब आप भी मस्त हो जाते हैं तो दुनिया कुछ ऐसा ही कहती है। आज कल फ़ुटबाल का फ़ीफ़ा विश्व कप चल रहा है, दुनिया भर के ४८ चुने हुए देश इस में हिस्सा ले रहे हैं, मेज़बान अमरीका, मेक्सिको, कनाडा , ब्राज़ील फ़्रान्स, इटली, जर्मनी, स्पेन, अर्जेंटीना, पुर्तगाल, मोरक्को, घाना, कोरिया,जापान,दक्षिण अफ़्रीका, नॉर्वे आदि इन में प्रमुख हैं।देखने वाली बात यह है कि दक्षिण एशिया का इस में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है, भारत, पाकिस्तान, बंगला देश, श्रीलंका, इंडोनेशिया, मलेशिया सब नदारद हैं। पर फिर भी फ़ुटबाल का बुखार सभी के सिर चढ़ा हुआ है। ऐसी दीवानगी तो हमारे देश में सिर्फ़ क्रिकेट के लिए है, फ़ुटबाल का जुनून तो पूरे विश्व पर छाया हुआ है।
अब आप शायद समझ गए होंगे कि मैं हम सब की तुलना अब्दुल्ला से क्यों कर रहा हूँ, इस शादी में तो कम से कम हम यही समझे जाएँगे न। किसी भी खेल में रुचि लेना और इतने बड़े आयोजन से उत्साहित होना तो स्वाभाविक है। पर हम तो अपनी मनपसंद टीम और चहेते खिलाड़ी के ऐसे प्रशंसक बन बैठते हैं कि उनका झंडा, उनकी जर्सी आदि भी अपना कर अपनी जी जान से उनकी जीत की कामना करते हैं और प्रफुल्लित होते हैं। कैसी विडम्बना है कि १४० करोड़ की आबादी वाले देश में एक भी फ़ुटबाल खिलाड़ी विश्व स्तर का नहीं है, और वहाँ डेढ़ लाख आबादी वाला करौको मज़े से खेल रहा है । सन ५० और ६० के दशक में हम कम से कम एशियाई फ़ुटबाल में तो अच्छे स्तर पर थे, १९६२ के एशियाई खेलों में तो हम ने स्वर्ण पदक भी जीता था। आज़ादी के तुरंत बाद ब्राज़ील ने हमें विश्व कप में खेलने के लिए आमंत्रित भी किया था, पर हमारी टीम भाग न ले सकी, कुछ ने कहा, हम नंगे पैर खेलना चाहते थे, जो आयोजनकर्ता मंज़ूर नहीं कर सकते थे, कुछ ने कहा हमारे पास टीम भेजने के लिए पैसे ही नहीं थे, शायद सच यही था ।
अल्लामा इक़बाल से माफ़ी माँगते हुए उन्ही के अल्फ़ाज़ों में “कुछ बात है कि फ़ुटबाल में जमती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-फ़ीफ़ा हमारा”। ऐसा नहीं है कि हमारे यहाँ क्लब स्तर के खिलाड़ियों की कमी है, एक ज़माने में पूर्व बंगाल और मोहन बाग़ान की टीमों के बीच पूरा बंगाल विभाजित था, वैसे ही मोहम्मेडन स्पोर्टिंग, सलगाओकर गोवा , मफतलाल, महिंद्रा बंबई आदि टीम भी देश की चुनिंदा टीमों में थी। अब तो क्रिकेट का नशा है और हॉकी फ़ुटबाल जैसे खेल हाशिए पर जा चुके हैं।
फिर फ़ुटबाल में वो बात कहाँ जो क्रिकेट में है, क्रिकेट ठहरा राजे रजवाड़ों का खेल, फ़ुटबाल तो हर कोई ऐरा ग़ैरा खेल सकता है, सिर्फ़ एक गेंद ही तो चाहिए, न मैदान की ज़रूरत न कोई महँगा ज़िरह बख़्तर, बस दो जोड़ी पैर और खेल शुरू। हालाँकि भारत में क्रिकेट को भी गली मोहल्ले का खेल ही बना दिया है, अंग्रेज़ तो इसे पाँच दिन में खेलते थे और वो भी पूरे ऐशो आराम के साथ, हर एक घंटे में चाय पानी के लिए विराम, दोपहर का भोजन और शाम की चाय सब खेल में ही शामिल था। अब हम तो भाई गली में प्लास्टिक या रबर की गेंद से भी खेल लेते हैं, बल्ले की जगह मोगरी (कपड़े धोने वाली) और विकेट की जगह पत्थर या दीवाल का भी उपयोग किया जाता है। पर फिर भी न जाने क्यों फ़ुटबाल देखने में सभी को बहुत मज़ा आता है, पर खेलने में नहीं।
मैं नहीं मानता कि हमारे खिलाड़ी शारीरिक रूप से सक्षम नहीं हैं, न ही अब पैसे की कोई कमी है, फिर यह गुत्थी क्यूँ नहीं सुलझ रही है? जैसे आइ पी एल (IPL) ने क्रिकेट में भी एक क्रांति ला दी है, वैसी आइ एस एल (Indian Soccer League) क्यों न ला सकी? क्या हमें यहाँ भी एक अदद ललित मोदी की तलाश है, जैसे क्रिकेट का लोकतंत्रिकरण हुआ कि छोटे छोटे गाँवों और क़स्बों से भी बेहतरीन खिलाड़ी निकल कर आने लगे, वैसे ही फ़ुटबाल में भी कुछ चमत्कार हो और हम भी फ़ीफ़ा में शामिल हो सके।
क्रिकेट की सफलता में १९८३ की अप्रत्याशित विश्व कप जीत का बहुत बड़ा हाथ रहा है, फिर सिनेमा के कलाकारों की तरह क्रिकेट के सितारे भी चमक उठे और उसी चकाचौंध से आकर्षित हो हर बच्चा अगला कपिल देव, सुनील गावस्कर, सचिन या कोहली बनने का सपना देखने लगा। फ़ुटबाल के सुनील छेत्री को भला कितने लोग जानते हैं, हालाँकि वे भी द्वितीय श्रेणी के यूरोपीय क्लब में खेल चुके हैं। पता नहीं क्यों अभी अम्बानी परिवार की इस पर नज़र नहीं पड़ी है, इतिहास गवाह है कि १९८७ के रिलायंस कप क्रिकेट ने भी भारत में क्रिकेट को लोकप्रिय बनाने में मदद की। अब तो अम्बानी अडानी टाटा बिड़ला महिंद्रा आदि का ही आसरा है, कि वे लोग आगे आएँ और हम अब्दुल्लाओं पर रहम खाएँ, ताकि हम अपनी ही शादी में दीवाने हो सकें।