‘जहाँ काम आवे सुई कहा करे तरवारि ‘, रहीम का वह दोहा तो हम सब को याद ही है, जो काम झालमुरी कर सकती है वो न तो झींगा और न ही रसगुल्ला कर सकता है। अब मिश्ती दोई और चमचम को कोई कैसे समझाए कि जीवन में मीठे के बग़ैर तो चल जाता है पर स्वादिष्ट तो चटपटा ही होता है। फिर झालमुरी तो कहीं भी, कभी भी खाई जा सकती, सुबह नाश्ते में चाय के साथ या फिर ऐसे ही घूमते फिरते किसी भी खोमचे वाले से ले कर दो-एक फंकी मार ली । गांधी जी ने भी दांडी यात्रा नमक सत्याग्रह के लिए की थी, वे चाहते तो किसी चीनी मिल तक यात्रा कर सकते थे, पर वे जानते थे, स्वाद तो नमक से ही आता है और फिर एक बार नमक खा लिया तो नमक हरामी तो नहीं कर सकते हैं न । मोदी जी ने भी अब बंगाल का नमक चख लिया है, नमक का हक़ तो अदा करना ही पड़ेगा।
झालमुरी की तो बन पड़ी है, चटपटी चाट पकौड़ी में उसको एक विशिष्ट स्थान जो प्राप्त हो गया है, नहीं तो सारी दुनिया बम्बईय्या भेल पूरी के ही गुण गाती रहती है। गोविंदा ने तो फ़िल्म में नाचते हुए भेल पूरी खा कर काफ़ी लोगों को मिर्च ही लगा दी थी। समोसे के आलू का भी कभी फ़िल्मी गीतों में ज़िक्र हुआ था, पर ‘घूरे के भी दिन फिरते हैं’ कहावत अब चरितार्थ हो ही गई है। वैसे तो यहाँ पर लोग वड़ा पाव, गोल गप्पे, आलू टिक्की के दीवाने हैं, पर इंदौरियों को तो पोहा मिल जाए फिर उन्हें किसी चीज़ की चाह नहीं रहती है। राहुल गांधी जी को शायद किसी ने इस राज के बारे में अब तक बताया नहीं वरना पिछले चुनाव में जैसे उन्होंने जनेऊ धारण कर मंदिरों का चक्कर लगाया, उसी तरह वे ठेलों और खोमचों पर चाट पकौड़ी खाते नज़र आते।
चुनाव जीतने के लिए नेता लोग कुछ भी करने के लिए राज़ी हो जाते हैं, अभी तक मंदिरों, गिरिजों, गुरुद्वारों, मस्जिदों तक यह सीमित था, फिर कपड़ों और पगड़ी, साफ़े, टोपी आदि पर उनकी नज़र पड़ी, साधु सन्यासियों के आश्रम, मौलवियों की दरगाह सभी पर नत मस्तक होने के बाद अब जा कर उन्हें समझ आया कि अंत में तो ज़बान और पेट से ही सफलता का रास्ता जाता है। इस ज़बान को ख़ुश रखना भी बहुत ही ज़रूरी है क्योंकि यदि यह फिसली तो आफ़त ही आ जाती है। हमारे नेताओं की तो वैसे ही ज़बान बेलगाम रहती है, हर कहीं उगल पड़ती है। जब ज़बान उगलती है तो कई राज टपक जाते हैं, फिर राजनीति में ही उबाल आ जाता है। इसलिए उसे निगलने में ही व्यस्त रखा जाना सभी के लिए श्रेयस्कर है। इतिहास गवाह है कि कभी कैकेयी की जिह्वा तो कभी द्रौपदी की जब चली तो राज-पाट दाँव पर लग गए। क्या पता उस समय झालमुरी जैसी कोई चटपटी चीज़ यदि उनके मुख में होती तो क्या वे फिर भी वही सब बोलती या करती, शायद नहीं! मोदी जी भी सोच रहे होंगे कि काश उन्होंने दीदी को पहले ही झालमुरी खिला दी होती तो बंगाल की ऐसी दुर्दशा तो नहीं होती। सुना है ईरानी मुल्ला भी अब ट्रम्प को झालमुरी ही खिला कर बहलाना चाहते हैं, जब ट्रम्प का मुख ही बंद होगा तो उनकी सोशल मीडिया के वाक् युद्ध को भी विराम मिले शायद।
वैसे सुना है अब पंजाब में छोले भटूरे वाले भी तैयारी कर रहे हैं, शायद अगला नम्बर उनका भी आ जाए। केरलम और तमिलनाडु में डोसा इडली वाले ठेले भी इंतज़ार में हैं शायद……