ट्रम्प ईरान समझौता दो देशों के बीच हुआ समझौता नहीं है,यह तो ट्रम्प और ईरान के बीच एक क़रार भर हुआ है। आम तौर पर जब युद्ध के बाद जब दो देशों या गुटों के बीच संधि होती है, तो उसकी पहली शर्त ही यह होती है कि युद्ध विराम घोषित किया जा चुका है और दोनों पक्ष उसका पूरी तरह से अनुसरण करेंगे। पर जहाँ ट्रम्प हों वहाँ कोई भी चीज़ सामान्य तो हो ही नहीं सकती है, अब चाहे वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति को मध्य रात्रि में अगवा करना हो या अपनी मन मर्ज़ी से सभी मित्र देशों पर भी टैरिफ़ थोपना हो या किसी संधि की शर्तों का सम्मान करना। यहाँ स्याही अभी सूखी भी नहीं है और इस्राएल के लेबनान पर हमले चल रहे हैं और निकट भविष्य में ऐसी कोई आशा भी नहीं है कि इस्राएल शांति चाहता है।
जब युद्ध शुरू हुआ था तो अमरीका और इस्राएल का मुख्य उद्देश्य ईरान में सत्ता परिवर्तन और ईरान की परमाणु क्षमता को स्थायी तौर पर ध्वस्त करना ही था। इस्राएल के ही उकसाने पर ट्रम्प ने यह क़दम उठाया था, और उन्हें यह विश्वास दिलाया गया था कि जब ईरान का शीर्ष नेतृत्व मार दिया जाएगा तो कुल जमा ३ या ४ हफ़्तों में सत्ता पलट हो जाएगी। जब सत्ता ही पलट जाएगी तो हिज़्बुल्लाह हमस और हूती जैसे आतंकवादी संगठन को ईरान से मिलने वाला समर्थन भी ख़त्म हो जाएगा। अब चूँकि नेथनयाहू के सारे मंसूबों पर पानी फिर गया है तो वे किस मुँह से आने वाले चुनावों में जनता के सामने जाएँगे, इसलिए उनके लिए ये जीवन मरण का प्रश्न है और वे इतनी आसानी से हार मानने वाले नहीं हैं।
ऐसे में एक महत्वपूर्ण प्रश्न जो देश विदेश के सामरिक विशेषज्ञों के सामने है, वह है आज की परिस्थितियों में परमाणु निवारण (‘नूक्लीअर डेटरेन्स’) और इन हथियारों की प्रासंगिकता। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् अमरीका को पहला झटका तब लगा जब रूस ने परमाणु विस्फोट कर अमरीका की बराबरी की घोषणा कर डाली। ब्रिटेन और फ़्रान्स भी जल्द ही इस क्लब में शामिल हो गए, पर जब चीन ने भी इस अभिजात्य वर्ग में दस्तक दी तो सब ने मिल कर परमाणु अप्रसार संधि (एन पी टी) कर ली ताकि विश्व के बाक़ी सभी देशों के पास यह तकनीक न पहुँच सके।एक तरह से इस से कम से कम युद्ध में परमाणु अस्त्रों का प्रयोग वर्जित जैसा हो गया। अमरीका कोरिया में और वियतनाम में, रूस अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सेनाएँ वापस बुलाने पर मजबूर हुए पर उन दोनों पर ही एक दूसरे की लगाम थी इसलिए परमाणु अस्त्रों तक बात नहीं पहुँची । पर शीत युद्ध की समाप्ति के बाद, जब अमरीका ही एकमात्र विश्व शक्ति बन कर उभरा था, तब भी किसी भी देश ने नूक्लीअर ब्लैक्मेल का हथकंडा नहीं अपनाया।
आज के परिप्रेक्ष्य में ये और भी प्रासंगिक है क्योंकि, अभी अमरीका ने ईरान के ख़िलाफ़ इनके प्रयोग की परोक्ष रूप से धमकी ज़रूर दी पर न तो इस का ईरान पर ही कुछ असर हुआ, न ही किसी और देश ने इस पर ध्यान ही दिया। कुछ ऐसा ही हाल रूस का भी है, पिछले ४ सालों से युक्रैन उसे बराबरी की टक्कर दे रहा है, पर रूस भी गीदड़ भभकी के अलावा कुछ न कर सका। भारत ने भी पाकिस्तान पर बेख़ौफ़ बेहिचक बालाकोट और सिंदूर के दौरान जैसे हमले किए, उसमें उन्होंने पाकिस्तान की परमाणु क्षमता और उसकी डेटरेन्स पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। पाठकों को याद होगा किस तरह संसद पर हुए आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन पराक्रम में भारत इसीलिए पूरी तैयारी के बाद भी तथाकथित रूप से पाकिस्तान की परमाणु धमकी के कारण ही उसे सबक़ सिखाने में हिचक गया था। इसमें एक अपवाद अवश्य है, उत्तर कोरिया शायद अभी तक अपनी परमाणु और मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) क्षमताओं के कारण ही बचा हुआ है। ईरान भी इसी पंक्ति में शामिल होना चाहता है ताकि इस्राएल का पश्चिम एशिया में क़ायम दबदबे को चुनौती दी जा सके।
विश्व की महाशक्तियों के सामने भी यही प्रश्न होगा कि क्या नूक्लीअर डेटरेन्स सच में असफल हो गई है, या उत्तर कोरिया की तरह और भी देश आज भी इस दिशा में आगे जाने की कोशिश करेंगे?