पिछले दिनों मोदी जी ने विरोधी दलों के नेताओं की “नाराज़ फूफाओँ” से तुलना कर डाली। मुझे इस तुलना से सख़्त आपत्ति है, और देश विदेश के सभी फूफाओं को भी होनी चाहिए। आख़िर हमने उनका क्या बिगाड़ा है जो वे इस तरह हमारे पीछे पड़ गए हैं।अब फूफा होना भी गुनाह ए अज़ीम हो गया क्या, एक तो हमने आपकी भुआ से शादी की, ज़िंदगी भर उनके नाज़ नख़रे उठाए और फिर कभी कभार यदि हमारी शान में गुस्ताखी हो तो हमारा थोड़ा बहुत रूठना भी इन्हें नागवार गुज़रता है। एक ज़माना था जब हम घर के कँवर साहब हुआ करते थे, पलक पाँवड़े बिछा कर हमारा इंतज़ार किया जाता था। ससुराल में हमारा एक अलग ही रूवाब होता था, खाने पहनने ओढ़ने सभी में पहले हमारा ही ध्यान रखा जाता था। ख़ैर वो कहानी फिर कभी, आज तो ज़रा मोदी जी दो दो हाथ हो ही जाएँ, भाई नाराज़ फूफा ही क्यों, नाराज़ मौसा क्यों नहीं? आख़िर नाराज़ी कोई सिर्फ़ फूफाओं की बपौती तो है नहीं, घर में जिस का मन हो वो नाराज़ हो सकता है और होते भी हैं, फिर सिर्फ़ हमें ही क्यों बदनाम किया जाता है? हिंदुस्तान में शादियों में भुआओँ का एक अलग ही रुतबा होता है, उन्हें मायक़े बड़े ही प्यार और दुलार से बुलाया जाता है, आख़िर घर की बहन बेटियों से ही तो घर में रौनक़ रहती है। ऐसे में बेचारा फूफा अचानक हाशिए पर चला जाता है और फिर इस तरह ‘नाराज़ फूफा’ कहना तो जैसे उनकी दुखती रग पर हाथ रखने जैसा है।
विरोधी दल के नेताओं का भी कुछ ऐसा ही हाल हो गया है, एक ज़माना था जब वे सत्तारूढ़ दल के सदस्य हुआ करते थे। जनता भी उन्हें पूजती थी और अफ़सर भी, उनके
पैर ही ज़मीन पर नहीं पड़ते थे। अब पिछले कुछ सालों से सत्ता के गलियारों का मुँह देखना भी नसीब नहीं हो रहा है, और जनता ने भी मुँह मोड़ लिया है, अफ़सरों ने भी घास डालना बंद कर दिया है, रूठे नहीं तो क्या करें? अब मुश्किल यह है कि इनकी नाराज़ी का सबब तो सबको समझ आ गया है, पर इनकी नाराज़ी दूर करने का जो एकमात्र उपाय है वो किसी के गले नहीं उतर रहा है। तो भाई जब वे अदनान सामी की तर्ज़ पर हर चुनाव के समय “कभी तो नज़र मिलाओ, कभी तो वोट दे जाओ…” गाते सुनाई पड़ते हैं तो उन्हें चाहिए फिर वही पुरानी सी मोहब्बत, जो वोट के साथ आती थी और सीधे संसद तक पहुँचाती थी, फिर कोई रोक टोक नहीं बस कुर्सी का परम आनंद! जनता तो ठहरी भोली भाली, उनके छलावे में आ भी जाए, पर जब जब उनका मन थोड़ा डोलता है तो उन्हें गुरु घंटालों के घोटालों की घंटिया फिर सुनाई देने लगती हैं, और वे फिर इन बेचारों से किनारा कर लेते हैं। और फ़ैज़ की वो मशहूर ग़ज़ल सुनाई पड़ती है..”मुझसे पहले सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग”। अब तो यह हाल हो गया है कि उन्हें सच में लगता है कि उनका पहला पहला प्यार “वोट” सच में चोरी हो गया है । अब इन्हें फूफा कहें या मौसा, या फिर चाचा या ताऊ, इन्हें मनाना तो पड़ेगा, आख़िर हम कब तक इन्हें इस तरह मुँह फुलाए देख सकते हैं? अब इन्हें कौन समझाए कि यह प्यार भी न तो चुराया जा सकता है न छीना जा सकता है, इसे तो कमाना ही पड़ता है। तो ग़ुस्सा छोड़ो और जनता के साथ मिल कर उनके भले के लिए ईमानदारी से काम करो, कृपा ज़रूर बरसेगी!
Bahut khoob.A nice and humorous satire bro..
ReplyDeleteहिन्दी पर भी बपौती झाड़ दिए हो भाई सुयश। सुझाव भी सही दिए हो कि ईमानदारी की लगन और मेहनत से ही जनता का आशीर्वाद पाओगे। काश pappu पढ़ और समझ ले इसे।
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