भारतवर्ष परीक्षाओं का देश है, यहाँ जीवन के हर क़दम पर परीक्षा की कसौटी पर खरा उतरना आवश्यक है। सड़क पर चलने में भी आम नागरिक उसके स्वयं के जीवन की परीक्षा से ही गुज़र रहा होता है। ज़रा चूक हुई कि ‘राम नाम सत्य’, जे सी बी, डंपर आदि तो दानवों की तरह फ़िराक़ में रहते ही हैं, पर मोटर साइकल सवार भी बेलगाम घुड़सवारों की तरह रणक्षेत्र में बिना किसी कवच के रोज़ उतरते हैं और अपनी जान की बाज़ी लगाते नज़र आते हैं। चूँकि वे सच्चे सनातनी भारतीय हैं और “ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या” जीवन की इस सच्चाई को अच्छे से जानते और समझते हैं अतः इस मिथ्या जीवन को दाँव पर लगाने में उन्हें आनंद ही आता है। जब उनका सामना स्कूल कॉलेज की परीक्षाओं से होता है, तो विरासत में मिली ‘साम दाम दंड भेद’ की चाणक्य नीति अपनाने में उन्हें ज़रा भी हिचकिचाहट नहीं होती है। अपनी डूबती नैया को पार लगाने के लिए प्रश्न पत्र की चोरी, सामूहिक नक़ल, मुन्ना भाई से प्रेरित प्रॉक्सी उम्मीदवार या अन्य कोई भी और अनुचित तरीक़ा उन्हें उचित ही लगता है। आख़िर ज़िंदगी की आपाधापी में ‘येन केन प्रकारेण’ आगे आने की लिए, कुछ तो बलिदान देना ही होगा, तो क्यों न कलियुग के इस बेइमानी के यज्ञ में सबसे आसानी से त्याग दिए जाने वाला गुण, “सत्यनिष्ठा” की ही आहुति दी जाए।
एक ज़माना था जब भारत में शिक्षा दीक्षा गुरुकुल में हुआ करती थी, ऋषि मुनि आश्रम में अपने शिष्यों के साथ रहते भी थे और उन्हें सभी विधाओं में पारंगत करने की चेष्टा भी करते थे। अब यहाँ गुरु तो बन गए हैं गुरु घंटाल, और आज कल आश्रम में जैसी गतिविधियाँ होती रहती हैं, उनसे तो रावण कंस और दुर्योधन भी शर्मा जाएँ ।आज हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था आइ सी यू में पहुँच चुकी है, और जीवन रक्षा (life support) पर वेंटिलेटर के सहारे ही जीवित है। ऐसे में जब नीट जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक हो सकते हैं, जिस में तक़रीबन २० लाख विद्यार्थियों की लगभग २ वर्षों की मेहनत पर इस तरह जब पानी फिर जाता है, तो आप समझ ही सकते हैं कि इस सड़े गले सिस्टम में कॉक्रोच ही तो पैदा होंगे। अब कॉक्रोच जिसे कुछ लोग तिलचट्टे के नाम से भी जानते हैं, एक ऐसा जीव है जो अच्छे अच्छे जाँबाजों के भी छक्के छुड़ा देता है। कॉक्रोच पैदा तो हो जाते हैं, पर इतनी आसानी से आप इनसे पिंड नहीं छुड़ा सकते हो, उसके लिए तो सफ़ाई अभियान ही एकमात्र उपाय है।
पर जहाँ समूची व्यवस्था ही लचर हो चुकी हो, तो यह सफ़ाई आख़िर करेगा कौन? क्या आप को ऐसा लगता है कि मंत्री और नेता गण यह बीड़ा उठाएँगे? उत्तर आप भी जानते हैं, वे तो इस व्यवस्था के पालक हैं फिर वे भला क्यों इसे छेड़ेंगे। नौकरशाही तो इसकी जनक है, वे ही तो ऐसी बढ़िया नीतियाँ बनाते हैं ताकि सभी साधारण जन मानस उन्ही की ओर देखता रहे उन नीतियों का मर्म समझने के लिए। बाबू लोग भी तो सच्चे सनातनी हैं, वे जानते हैं कि जैसे वेद और उपनिषद आदि केवल पढ़ने से समझ नहीं आते हैं। उन्हें समझने के लिए गुरु की आवश्यकता होती है, जो उन्हें इसका मर्म समझा सके, ठीक वैसे ही बाबू वर्ग ने अपनी नीतियाँ बनाई हैं। तभी तो इस व्यवस्था का लाभ उन्हें बराबर मिलता रहता है, यदि सब कुछ सरल कर दिया जाए तो उनका होना न होना बेमानी हो जाएगा, जो उन्हें कदापि रास नहीं आएगा। यदि साधक सीधे भगवान को सम्बोधित करने लगे तो फिर बेचारे पंडितों का क्या होगा? फिर ले दे कर रह गई बेचारी जनता, उन्हें ही लेने देने के अलावा कुछ और करना होगा। उनके पास तो एक ही हथियार है उनका ‘अधिकार’, उनका “वोट”, वो भी आदत से मज़बूर वे कभी धर्म और कभी जाति पर न्यौछावर कर आते हैं। फिर उनकी इस अग्नि परीक्षा की घड़ी में उन्हें ही तय करना है कि क्या उनकी नियती कॉक्रोच की तरह परमाणविक (नूक्लीअर) नरसंहार तक इंतज़ार करना है या फिर…..
👍
ReplyDeleteबेहद सटीक पर समूचित हास्यापद लेख। विडम्बना है कि युवा वर्ग का भविष्य और देश का भविष्य दोनो दावं पर हैं पर संकुचित सोच और स्वार्थी मनशा से ग्रस्त समाज पूंजीवाद के आगे घुटने टेके बैठा है। बांग्लादेश और नेपाल के उदाहरण को हम भूल चुके हैं। सक्त डंडे और जेल से ही द्रोही का स्वागत होना अनिवार्य है।
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